सोमवार, 20 जून 2011

या चाटुकारिता तेरा ही सहारा!

जब से कुछ समाचार पत्रों में यह खबर छपी है कि अब चाटुकारिता पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जायगा, तभी से कतिपय 'हायर सर्किलÓ में चिंता व्याप्त है। धड़ाधड़ एसएमएस किये जा रहे हैं, मोबाइल पर फोन पर फोन हो रहे हैं कि अब क्या होगा? इनमें से कुछ का तो यह भी कहना है कि जो बात मुगलों के जमाने से चली आ रही है, वह यह सरकार ऐसे कैसे बंद करा सकती है?
अंग्रेजों के जमाने में भी कई राजा-महाराजा उनके तलुए चाटते थे। कई और लोग भी थे जिन्हें अंग्रेजों द्वारा राय बहादुर, खान बहादुर की पदवियों से नवाजा गया। बहुत लम्बी-चौड़ी लिस्ट है। अधिकतर राजा-महाराजा स्वतंत्रता के आंदोलन को दबाते थे। यही लोग ईद-दिवाली-क्रिसमस पर अंग्रेजों को डॉलियां, नजराना भेंट किया करते थे। इसलिए वह जाते-जाते इन्हें स्वतंत्रता दे गए कि चाहे तो आप भारत में मिलें, चाहे पाकिस्तान में मिलें और चाहें तो स्वतंत्र रहें। जम्मू-कश्मीर, जूनागढ, हैदराबाद इनके उदाहरण हैं, देखिए क्या इनाम दिया है? तभी तो कहा है, 'प्रति उपकार करो का तोरा, सन्मुख होय न सकत मन मोराÓ अर्थात आपने हमारे पर जो एहसान किया है, उसका बदला नही चुकाया जा सकता। देश आजाद हुआ तो अंग्रेज तो चले गए लेकिन यह लोग यहीं रह गए, लेकिन इन्होंने अपनी स्वामी भक्ति बदल कर नये राजाओं अर्थात मंत्रियों, सरकारी अफसरों इत्यादि के प्रति कर ली, जिससे कि इनकी पौ-बारह होती रहे। बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं सिर्फ आपातकाल के समय से ही चलें। देश के सबसे बड़े दल के अध्यक्ष ने उन दिनों एक बार अपने ज्ञान का परिचय देते हुए कहा, 'इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडियाÓ। अब आप ही बतायें कि और क्या कहने-सुनने को बाकी रह गया? उसी अवधि के दौरान उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अपनी स्वामी भक्ति का परिचय देते हुए एक नाला पार करते वक्त तत्कालीन 'युवा सम्राटÓ की चप्पलें उठाई थीं, तो राजस्थान में मुख्यमंत्री ने 'युवा सम्राटÓ को ऊंट पर सवारी में मदद करने हेतु अपना कंधा आगे कर दिया था। ऐसा नहीं है कि समय बीतने के साथ-साथ इस श्रेणी के लोगों की संख्या में कमी आई हो, बल्कि दिनों दिन इसमें इजाफा ही हुआ है, जिसकी झलक हमें कुछ दिनों पूर्व उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के ओरैया दौरे के दौरान देखने को मिली, जब उनके साथ गए डीएसपी ने उनके जूते साफ किए। इतना ही नहीं इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उत्तरप्रदेश के ही कैबिनेट सैक्रेट्री ने यहां तक कह दिया कि इसमें कुछ गलत नहीं है। अगर मैं वहां होता तो मैं भी यही करता।
कुछ दिन पूर्व एक नेताजी ने वर्तमान युवराज की तुलना जयप्रकाश नारायण से करके अपने अदभुत ज्ञान का परिचय दिया। इन नेताओं की छत्रछाया में पल रहे छुटभैये चाटुकारिता के माध्यम से येन केन प्रकारेण सप्लाई ऑर्डर, लायसेन्स, परमिट, कोटा इत्यादि प्राप्त कर लेते हैं। कुछ पेटोल पम्प, गैस ऐजेन्सियां हथिया लेते हैं, फ्लैट हथिया लेते हैं। इसी जमात के कुछ लोगों ने तरह-तरह की गैर सरकारी संस्थाएं, एनजीओ, बना कर विदेशी एवं सरकारी धन हथियाने एवं विदेश यात्रा करने के लिए अपना उल्लू सीधा करने का तरीका निकाला हुआ है। ऐसे में कोई तलवे चाटने को गैर कानूनी घोषित करने की मांग करेगा तो भला इनको सहन कैसे होगा?
तलवे चाटने वालों में जो ज्यादा घुटे हुए, रिफाइंड हैं, वे रक्षा सौदे में दलाली का काम करते हैं क्योंकि वह ऊंचे दर्जे की बातें हैं। चाटुकारों में से कुछ लोग जब तब सरकारी खर्च-खाते पर अपना इलाज कराने अथवा पत्नी सहित विदेश यात्रा करने का लुत्फ उठाते रहते हैं। कुछ लोग हिन्दी के विशेषज्ञ बन कर विदेशों में हिन्दी सम्मेलनों में जा कर उसे हिन्दू सम्मेलन बनाने की कोशिश करते हैं।
खेलों में चाटुकारों का कितना वर्चस्व है यह बात किससे छिपी है? आलेम्पिक में खिलाड़ी जायेंगे, पचास तो अधिकारी जायेंगे डेढ़ सौ और मैडल आयेंगे एक या दो। तलुवे चाटने वाले सरकारी मकहमे में तो भरे पड़े हैं। इनको दूसरो का हक मार कर मैरिट से प्रमोशन लेने की कला का बहुत ज्ञान है। जाति समाज में ऐसे लोग पैसे वालों तथा जिन्होंने सालों से धार्मिक स्थलों एवं ट्रस्टों तथा शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा किया हुआ है, के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं और उनकी जय-जयकार करते रहते हैं। ऐसे में इस कला को कौन गैर कानूनी घोषित होने देगा?
यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर .10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333

शुक्रवार, 10 जून 2011

अब जूतों का समय है

सर्वविदित है कि जब अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में ईराक गए तो बगदाद में एक संवाददाता सम्मेलन में एक टीवी चैनल के पत्रकार ने उन पर जूते फैंके। इसके बाद तो ऐसी घटनाओं का जैसे सिलसिला ही चल पडा है, जिसमें हमारा देश भी पीछे नही है। पहले देश के गृहमंत्री पर एक पत्रकार ने जूता फैंका फिर हरियाणा के कांग्रेसी सांसद पर जूता फैंका गया और फिर बीजेपी के शीर्ष नेता पर उन्हीं के दल के एक पदाधिकारी ने भरी आम सभा में मध्यप्रदेश के कटनी में खडाऊ फैंक दी। हालांकि उनकी ही पार्टी के लोगों ने सफाई दी कि उसने चप्पल नहीं खडाऊ फैंकी थी और अब भ्रष्टाचार और नित नए उजागर होने वाले घोटालों के प्रति गुस्से का इजहार करते हुए एक नवयुवक ने कांग्रेसी प्रवक्ता को जूता दिखाया। इससे लगता है कि एक बार फिर जूतों का समय आ गया है।
आपको याद होगा कुछ साल पूर्व रात्रि समाचारों से पहले दूरदर्शन चैनल पर लिखा आता था 'शूज टाइमÓ अर्थात 'जूतों का समयÓ। उसे पढ़ कर लोग तरह-तरह के मतलब लगाते थे। कोई कहता था कि अब यानी रात्रि 8.40 बजे जूते का समय है, जैसे किसी के खाना खाने का समय निश्चित होता है तो कहते हैं कि खाने का समय हो गया, ऐसे ही किसी का पीने का, किसी के आने का, किसी के जाने का समय होता है और कोई निश्चित समय पर दवाई लेता है तो उसे याद कराया जाता है कि आपका दवाई का समय हो गया। इसी तरह दूरदर्शन हमें याद कराता था कि अब जूते का समय है।
इतिहास गवाह है कि इसकी शरुआत मध्यप्रदेश विधानसभा से हुई थी। कई साल पहले की बात है। तब वहां की विधानसभा में जनसंघ दल के उपनेता पंढारीराव कृदत ने सदन के अंदर ही विधानसभा उपाध्यक्ष श्रीवास्तव पर जूता फैंका, जो उनके सिर पर जाकर लगा। इसके बाद तो कई जनप्रतिनिधियों ने कई बार लोकतंत्र पर प्रहार किया। हाल के वर्षों में जूतें फैंकने की घटना हुई। उड़ीसा विधानसभा में वहां विधायकों ने आपस में जूतम-पैजार कर ली। 'उत्तम प्रदेशÓ में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई राजनैतिक दल चुनाव में हार जाता है और सत्ता से वंचित हो जाता है तो उनके यहां जूतियों में दाल बंटनी शुरू हो जाती हैं। कोई किसी को नोटिस देता है तो कोई किसी को दल से निकाल देता है। सरकार भी टीवी के माध्यम से कहती थी कि अब 'जूतें का समय हैÓ लेकिन यह खुलासा नहीं करती थी कि जूते दिखाने का समय है कि जूते सुंघाने का, या कि जूते मारने का, क्योंकि आंतकवादियों को प्रशिक्षण देने वालों, उन्हें उकसाने वालों, उन्हें शरण देने वालों को सरकार वर्षों से जूता दिखा रही है। उन्हें जूता सुंघाती क्यों नही है ? कई लोग इसे जूते उठाने का समय मानते थे, परन्तु यह बातें तो आपातकाल में ज्यादा हुई थीं, जब एक मुख्यमंत्री ने किसी गैर संसदीय हस्ती के जूते उठाये बताये। अब राजनीति में छुटभैये तरह-तरह के चापलूसी हथकंडे अपनाने लगे हैं। इन्हीं लोगों की देन है कि देश में अप्रैन्टिस प्रधानमंत्री हैं।
वैसे इस देश में प्राचीनकाल से ही जूतों की महिमा रही है। रामायण काल अर्थात त्रेता युग में भरतजी ने 14 वर्षों तक पादुकाओं को ही सामने रखकर राज्य चलाया था। द्वापर यानि महाभारत संग्राम के समय भी खडाउओं का जिक्र आया है। भीष्म पितामह से मिलने जाते वक्त कृष्ण ने द्रौपदी की खडाऊ अपने बगल में छिपाई थी।
वैसे जूतों की महिमा कम नही है। इसे चरण पादुका, खडाऊ, पगरख्या, मोचड़ी, बूट इत्यादि कई नामों से जाना जाता है। प्रथम महायुद्व के समय अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान के लोगों को फौज में भर्ती करने हेतु निम्नलिखित गाना बनवाया था, जिसे फौजी बैंड आज भी बजाते हैं-
'थारो नाम लिखाद्यू रंगरूट, होजा पलटन म्हे अठे
मिलेली तन्हे फांटी जूत्या, कोई बठै मिलेला बूट
.... हो जा पलटन म्हेÓ
प्राचीनकाल में चीन मेंं लड़कियों को बचपन से ही लोहे के जूते पहना देते थे क्योंकि लडकियों के छोटे पैर वहां सुंदरता की निशानी मानी जाती है। शादी-ब्याह में सालियां जीजाजी के जूते छिपाने की रस्म किया करती हैं। फिल्म 'हम आपके हंै कौनÓ में तो जूतों को लेकर काफी नोंक-झोंक होती है। कई जगह बराती तेारण के समय जाते वक्त चेहरे से ज्यादा जूतों को चमकाते हैं। जूतों के निशान से खेाज कर खोजी लोग चोरों को पकड़ लेते थे। यह जूते की महिमा तो बाद में कम हुई है, जबकि लोग सिनेमा हॉल में धार्मिक पिक्चर लगने पर जूते हॉल के बाहर ही खोल कर जाने लगे तथा घरों में रामायण और महाभारत सीरियल देखते वक्त जूते-चप्पल उतार कर ही देखते थे। एक समय वह भी आया जब सांमतवादी युग में अपने को उच्च वर्ग कहलाने वाले कुछ लोग निम्न जातियों को पांव की जूती समझते थे। अब वह बंधन टूट रहे हैं तो तथाकथित उच्च वर्ग को गंवारा नहीं हो रहा है। उस समय देश का आम नागरिक जब टीवी पर जूते का समय देखता था तो उसे याद आता कि उसका कोई भी काम हो अपना जूता तो वह सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा-लगा कर पहले ही घिसा चुका है, जबकि धनवान लोग अपना काम चांदी के जूते से फौरन करवा लेते हैं। दोनो के आखिर जूते ही काम आते हैं। खुली अर्थ व्यवस्था के साये तले देश के नौजवान बेकारी के आलम में अपने जूते-चम्पल धिस ही रहे हैं। मेरा कहना तो इतना ही है कि अगर आप को टीवी पर दिखाना ही था तो जैसे महाभारत सीरियल में घटोत्कच को रूपा बनियान पहने दिखाया गया था और दूसरे में तक्षशिला के एक ब्रहचारी ने लक्खानी चपल पहन रखी थी। वहां तक तो ठीक है, लेकिन अब आप टीवी पर किसी को जूते दिखाते, मारते दिखायेंगे तो प्रचार चाहने वालों को बढ़ावा ही मिलेगा और इससे किसी के घर अथवा सभा-सोसायटी में जूते बजने शुरू हो गये तो इसकी जिम्मेवारी किसकी होगी? उस महाभारत को कौन संभालेगा?
यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333

गुरुवार, 9 जून 2011

अजमेर का ग्रामीण अंचल और हास्य रस

ऐसा नहीं है कि अजमेर के शहरी हलकों के लोग ही अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में जब-तब हंसी-मजाक करते रहते हों, बल्कि इस इलाके के ग्रामीण अंचल के लोग भी हास्य रस का मजा लेने में किसी से पीछे नही रहते है। अब आप इस घटना को ही लें। यह उस जमाने की बात है, जब न केवल पुष्कर बल्कि आनासागर, फॉयसागर, बूढा पुष्कर इत्यादि सभी सरोवर कम से कम बरसात में तो लबालब भरे रहते थे। पुष्कर के आस-पास जमीन में भी पानी काफी ऊंचाई तक रहता था और इसी वजह से वहां गन्ने की खेती भी होती थी। कार्तिक मास में पुष्कर मेले पर गन्ने का खूब इस्तेमाल होता था। मेले के अवसर पर कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी इत्यादि भी होते रहते हैं। ऐसे में एक बार रात्रि में एक कवि सम्मेलन चल रहा था। ग्रामीणों की भी अच्छी खासी भीड थी। इतने में मंच पर एक धाकड़ कवि आए और आते ही उन्होंने श्रोताओं को ललकारा 'किस रस में सुनना चाहते हो? शायद उनका तात्पर्य साहित्य के वीर रस, शृंगार रस, हास्य रस इत्यादि से रहा होगाा। कवि महोदय की ललकार सुन कर भीड में से एक ग्रामीण अपनी लाठी सहित उठा और बोला कि आज तो हमतो गन्ने के रस में सुनेंगे भाई! नतीजा यह हुआ कि इधर भीड़ तो ठहाके लगा रही है और उधर कवि महोदय खिसियानी हंसी हंस रहे हैं।
बीसवीं सदी के शुरू में जब दिल्ली-अहमदाबाद मीटर गेज लाइन बिछाई गई और उस पर पहले पहल जब भाप का इंजिन दौडाया गया तो कहते हैं कि अजमेर- मेरवाड़ा के मगरा क्षेत्र, ब्यावर के आस-पास के लोग भाग-भाग कर अपने घरों में छिप गए थे। बाद में उन्हें समझा-बुझा कर बाहर निकाला गया और उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में इंजिन की पूजा की, तब कहीं जाकर उनका डर खुला। शुरू में लोग इस घटना को कपोल कल्पित मानते थे, लेकिन जब साठ के दशक में उदयपुर-हिम्मतनगर मीटर गेज लाइन डाली गई और जब उस लाइन पर सर्व प्रथम ट्रयल हेतु भाप का इंजिन चला तो रास्ते में पडऩे वाले बिच्छीवाड़ा गांव के आस-पास के आदिवासी लोग भी इंजन को भूत समझ कर भाग कर अपनी झोंपडिय़ों में जा छिपे थे, तब कहीं जाकर लोगों को उस पहली वाली बात पर विश्वास हुआ।
वर्षों पूर्व की बात है। तब अजमेर-मेरवाड़ा के गांवों में तो क्या कई कस्बों तक में बिजली नही पहुंची थी। गांवों के लोग घरों में कैरोसीन से चिमनी अथवा लालटेन जला कर रोशनी किया करते थे। एक बार ऐसा हुआ कि एक जगह मिट्टी का तेल घरों में भी खत्म हो गया और गांव के दुकानदार के यहां भी। बड़ी हाय-तौबा मची। हार-थक कर गांव के अधिकांश लोग पास के कस्बे में पहुंचे। उन्हें सड़कों पर नगरपालिका के लैम्प पोस्ट दिखाई पड़े। भीड़ में मौजूद विरोधी दल के एक नेता ने उन्हें उकसा दिया कि आप लोग इन खम्बों से घासलेट क्यों नहीं निकाल लेते? इतना कह कर वह नेता तो गायब हो गया और लोग एक खम्बे के पास इकट्ठा हो गए और गैंती-फावड़ों से उसे तोडऩे लगे। यह तो भला हो गांव के मास्Óसाब का जो उसी समय अपनी साइकिल पर उधर से निकल रहे थे, उनकी नजर उस पर पड़ी और उन्होंने माजरा समझ कर गांव वालों को समझाया कि यह तो नगरपालिका के बिजली के खम्बे हैं, इनमें घासलेट नहीं है, तब कहीं जाकर गांव वाले वापस हुए वर्ना उस रोज कुछ न कुछ होकर रहता।
पहले जब साल के कुछ दिनों खेतों में काम नहीं होता था, तब गांव वाले अक्सर ही चौपाल अथवा हथाई पर बैठ कर दुनियादारी की बातें करते रहते थे। एक बार की बात है कि लोग चौपाल पर बैठे हुए थे, तभी उधर से कुछ राहगीर निकले। उन्होंने जिज्ञासावश गांव वालों से पूछ लिया कि इस गांव के लोग क्या करते हैं? इस पर वहां बैठे एक ग्रामीण ने जवाब दिया कि सर्दियों में इस चबूतरे के पूरब की तरफ आकर बैठ जाते हैं और धूप के साथ-साथ सरकते हुए शाम होते-होते पच्छिम की तरफ पहुंच जाते हैं। और गर्मियों में, आगंतुक ने पूछा। गर्मियों में हम लोग मुंह अंधेरे ही पच्छिम की तरफ आ कर बैठ जाते हैं और सांयकाल होते-होते छाया के साथ सरकते हुए पूरब की तरफ पहुंच जाते हैं। इस पर आगंतुक यह कहते हुए चले गए कि बहुत व्यस्त रहते हो।
पुष्कर धार्मिक स्थल तो है ही, देशी-विदेशी सैलानियों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण स्थल है। कभी-कभी विदेशी सैलानी पुष्कर के आस-पास के गांवों की तरफ भी निकल जाते हैं। एक बार की बात है कि कुछ विदेशी सैलानी गनाहेड़ा से कुछ आगे सिलोरा की तरफ निकल गए। वहां गांव की चौपाल पर बैठे कुछ लोगों से दुभाषिये की मार्फत उन्होंने पूछा कि क्या यहां कोई बड़ा आदमी पैदा हुआ है?
'साÓब! यहां तो सब बच्चे ही पैदा होते हैं। आज तक यहां कोई बड़ा आदमी पैदा नहीं हुआÓ गांव वालों ने कहा।
जैसा कि आप जानते ही हैं गांव में अक्सर पीने के साफ पानी की कमी रहती है, इसके लिए सरकार, चाहे दूर से ही लाए, पाइप लाइन डाल कर पानी लाती है। ऐसे में एक बार जलदाय विभाग के कुछ कर्मचारी सर्वेक्षण हेतु लेवल पेटी, नापने जोखने के कुछ यन्त्र, फीता इत्यादि लेकर गांव में पहुंचे। उन्हें देख कर गांव वाले वहां जमा हो गए। जिज्ञासावश उन्होंने कर्मचारियों से पूछा कि यह सब किसलिए? तो कर्मचारियों ने बताया कि जहां पानी उपलब्ध है वहां से गांव तक छोटे से छोटे रास्ते होते हुए पाइप लाइन बिछानी है। इस पर गांव वालों ने कहा कि इत्ती सी बात के लिए इतना ताम-झाम करने क्या जरूरत है, हमें तो जब ऐसे रास्ते की खोज करनी होती है तो हम एक गदे को डंडा मार कर उस ओर हांक देते हैं, वह जिस रास्ते होकर जाता है, वही छोटे से छोटा रास्ता होता है। चाहें तो आप भी आजमा लें।
सरकार का कहना है कि वह गांव वालों के लिए कई कार्यक्रम चलाती है, परन्तु जनता उसमें हिस्सा ही नहीं लेती। उदाहरणार्थ एक बार गांव में साक्षरता अभियान चलाया गया। इसके लिए जगह-जगह पोस्टर लगाए गए, जिसमें लिखा था गांव वाले साक्षर बनने के लिए डायरेक्टर, साक्षरता कार्यक्रम को प्रार्थना पत्र भेजें। उसमें अपना नाम, उम्र एवं पता स्पष्ट शब्दों में लिखें। लिफाफे पर टिकट भी लगा दें।
एक और सच्ची घटना सुनें। गांव वाले सरकार द्वारा समय-समय पर चलाये जा रहे कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेने लगे हैं। ऐसे ही परिवार नियोजन के एक कैम्प में एक छोटे से गांव के सभी पुरुषों ने अपने-अपने ऑपरेशन करवा लिए, जब विभाग वाले जाने लगे तो तीन कुंआरे नौजवान उनके पास आए और अपने आप को ऑपरेशन के लिए पेश किया। कर्मचारियों ने उन्हें समझाया कि हमें नौजवानों और वह भी कुंआरों के ऑपरेशन करने की मनाही है। पहले भी युवक सम्राट के आदेश पर आपातकाल के दौरान ऐसे केसेज हुए थे तो हमारे विभाग के कई लोगों पर मुकदमे दायर हुए थे, जिनकी कोर्ट-कचहरी में अभी तक तारीखें चल रही हैं, इसलिए हम यह ऑपरेशन नही करेंगे, फिर भी उन्होंने युवकों से पूछा कि आप लोग ऑपरेशन हेतु इतनी जिद क्यों कर रहे हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि 'साÓब आपने गांव के सभी पुरुषों के ऑपरेशन कर दिए अब खुदा न खास्ता गांव में कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो उसके लिए हमी को जिम्मेवार ठहराया जायगा। फिर न पंचायत हमारी कुछ सुनेगी और न पुलिस। तब कहीं जाकर विभाग वालों के बात समझ में आई।
गांवों में अब भी आखातीज पर छोटे-छोटे बच्चों की थोक में शादियां होती हैं। ऐसी शादियों में नेता तो शामिल होते ही हैं, जागरूक नागरिक भी कुछ नहीं करते। पुलिस थाने के सामने से बरात निकल रही है और कोई कुछ नहीं कहता। पुलिस का कहना है कि कोई हमें लिखकर दे कि ऐसी शादी हो रही है तभी कुछ किया जा सकता है क्योंकि आम जनता का मामला हो तो हर चीज पुलिस लिखित में मांगती है और रसूखदार का मामला हो तो मूक जुबानी आदेश मानती है। खैर, ऐसी ही एक शादी की बात है। रात्रि में खाना खाकर दूल्हा-बराती सभी सो गए। जब आधी रात को फेरे की रस्म का मौका आया तो दूल्हे के बाप ने दूल्हे को झकझोरा और कहा 'चल उठ, फेरा खालैÓ, दूल्हा गहरी नींद में था, उसने आधी नींद में ही जवाब दिया 'म्हनै भूख कोनी, थे ही खाल्योÓ, लेकिन लडके का बाप आसानी से हार मानने वाला नहीं था। उसने लडके को फिर झकझोरा, 'अरे! उठ जा फेरे खाकर फिर सो जाना।Ó लडृके ने इस बार अपना पैंतरा बदला और कहा कि कांदा कै साथ खाऊं। अब कंवर साहब के लिए कांदा यानि प्याज की खोज होने लगी। इसीलिए दूल्हे को राजा कहते है, चाहे एक दो दिन का ही हो।
एक बार ब्यावर तहसील के टाटगढ के पास किसी गांव में रामभरोसे के घर डाका पडा। दो-तीन रोज बाद पुलिस आई और बड़े रौब से थानेदार साहब ने रामभरोसे से पूछा-
...क्या तुमही रामभरोसे हो?
...हुकुम! मैं ही क्या अब तो सारा परिवार ही रामभरोसे है।
...डकैती पडी तब क्या वक्त था?
...बुरा वक्त था हुजूर! रामभरोसे मिमियाया
...ओहो! मैं पूछता हंू बजा क्या था? थानेदार साहब ने झुंझलाते हुए कहा
...सिर पर लाठी बजी थी, सरकार!
...अबे! घडी में क्या बजा था, एक सिपाही बोला।
...घडी में अलार्म बजा था, रामभरोसे बोला।
यह सुनकर थानेदार साहब झुंझला कर मकान के बाहर आ गए और
तफ्सीस साथ के सिपाही को सौंप दी।
तो यह थी अजमेर के ग्रामीण अंचल की चंद हास्य रस की घटनाएं, जो आपको बताई हैं, ताकि सनद रहे और वक्त बेवक्त काम आएं।
यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333

शुक्रवार, 3 जून 2011

साम्यवाद के जनक श्री कृष्ण


आधुनिक साम्यवाद के प्रणेता कार्ल माक्र्स, लेनिन एवं माओत्से तुंग के समय से भी काफी पहले भारतवर्ष में एक ऐतिहासिक महापुरुष का प्रादुर्भाव हुआ था, जिन्होंने न केवल गरीब, असहाय एवं दलितों पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया, उनके हितों के लिए संघर्ष किया बल्कि तत्कालीन धार्मिक पाखंड एवं थोथे कर्म कांडों का भी विरोध किया और बदले में समाज में उचित रीति रिवाजों के प्रचलन के लिए लोगों को प्रेरणा दी। वह महापुरुष थे श्री कृष्ण, जिनको हिन्दू परायण जनता भगवान का अवतार मानती है। जैसा कि सर्वविदित है साम्यवाद की मूलभूत धारणा है, मनुष्य मनुष्य सब समान हैं, इनमे ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है और जो समाज के कमजोर तबकों पर अत्याचार करता है, उसे सजा मिलनी ही चाहिए। इसके साथ ही हमारी कोशिश हो कि हम एक ऐसे समाज का निमार्ण कर सकें, जिसमे स्वार्थपरकता, एक ही व्यक्ति अथवा परिवार का निरकुंश एवं ठाट-बाट का शासन नहीं हो। न ही किसी तरह का उत्पीडऩ हो। श्री कृष्ण ने अपने काल में यही सब किया। उनके जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कैसे उन्होंने आज से 5000 साल पहले इन सिद्धान्तों एवं विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी थी। अगर कोई गीता का समुचित अध्यन करे तो यह पायेगा कि उसके सर्जक श्रीकृष्ण, कार्लमाक्र्स से भी अधिक साम्यवादी थे। यहां तक कि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि साम्यवाद के जनक श्रीकृष्ण ही थे। श्रीकृष्ण ने उस समय चारों ओर फैले अंध धार्मिक कट्टरपन के विरुद्ध आवाज उठाई। यह भी सर्वविदित है कि उस समय लोगों में यह धारणा फैली हुई थी कि इन्द्र को प्रसन्न करने हेतु किसी जीव की बली देना आवश्यक है। श्री कृष्ण ने इस प्रथा का विरोध किया और लोगों के स्वाभिमान को जगाया। श्रीकृष्ण ने ही गायों की पूजा शुरू करवाई, जो कि हमारे तत्कालीन कृषि जीवन का आधार थी। श्रीकृष्ण ने सर्वजन के भूख की निवृत्ति हेतु अन्नकूट की प्रथा शुरू करवाई ताकि सबके लिए अन्न की व्यवस्था हो और कोई भूखा नहीं सोए। श्रीकृष्ण ने उन लोगों का भी विरोध किया जो हर बात में वेदों का उदाहरण देकर अपनी बात मनवाने का प्रयास किया करते थे। श्रीकृष्ण ने गीता में विस्तार से वर्णन किया है कि जो व्यक्ति अंध विश्वास के वशीभूत होकर अपनी छोटी-छोटी कामनाओं की पूर्ती हेतु विभिन्न देवी-देवताओं के निमित तरह-तरह के कर्मकांड करते हैं, वे मूढ़ हैं। उन्होने यह भी कहा कि जो कई देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, धार्मिक अंध विश्वास एवं थोथे रीति-रिवाजों को मानते है, उन्हें अधिक बुद्धिमान नहीं माना जा सकता। श्रीकृष्ण ने जिन्दगी के हर क्षेत्र का अध्ययन करने के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला और अर्जुन से कहा कि तू सब धर्मों का त्याग करके मेरी शरण में आ जा। जैसा कि बाद में कार्ल माक्र्स ने भी कहा था कि, थोथे कर्म कांडों वाला धर्म आम लोगों के लिए अफीम के समान है, परन्तु धर्म से भी आगे बढ़ कर सत्य की खोज करने की प्यास हमेशा से रही है। आदमी के जेहन में सवाल उठता रहा है कि मृत्युपरान्त आदमी कहां जाता है? इसका उत्तर श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से गीता में सबको देते हैं, जो कि अध्यात्म का हिस्सा है, लेकिन आधुनिक साम्यवाद के ग्रन्थों में इसकी झलक देखने को नहीं मिलती है। गीता को पढऩे से इंसान को सृष्टि के सृजनात्मक पहलू की गहरी जानकारी प्राप्त होती है, जिसके बगैर जिन्दगी शुष्क बन कर रह जाती है। यहीं आकर धर्म एवं अध्यात्म का भेद प्रकट होता है, जो कि साम्यवाद के ग्रन्थों में नदारद है और यह पहलू सिर्फ श्रीकृष्ण की गीता में उपलब्ध है। साम्यवाद किसी भी अवस्था में श्रीकृष्ण को नही भुला सकता है क्योंकि साम्यवाद के तमाम सिद्धान्तों में श्रीकृष्ण पहले से ही कारगर ढंग से मौजूद हैं। इस बात को हम नजर अंदाज नहीं कर सकते और अगर करते हैं तो हम पायेंगे कि हमने सिर्फ एक धर्म की जगह दूसरे धर्म को, जिसका कि नाम साम्यवाद है, रख दिया है। मुझेे आश्चर्य होता है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों ने अभी तक भी श्रीकृष्ण को क्यों नहीं अपनाया है?
गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कई बार कहा है कि जो व्यक्ति प्रत्येक जीव में मेरी छवि देखता है, प्रत्येक व्यक्ति में अपनी स्वयं की मूरत देखता है, वह सत्य के दर्शन करता है और यही तथ्य साम्यवाद का मूल सिद्धान्त है, यानि आम व्यक्ति को अपना मान कर उसकी भलाई की कोशिश करना। केले के छिलके की उपयोगिता तभी तक है, जब तक कि उसके अंदर केला मौजूद है, परन्तु ज्योंही हम केले का इस्तेमाल कर लेते हैं तो हम केले को कूड़ेदान में फैंक देते हैं। ठीक इसी तरह कर्मकांड का धर्म हमें हमारे लक्ष्य, अंतिम सत्य तक नहीं ले जाता। उसके लिए व्यक्ति को अपने मन की गहराई में उतर कर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की तरफ जाना पड़ता है। यहां आकर तथाकथित धर्म बाहर ही खड़ा रह जाता है और व्यक्ति शुद्ध मानवता, शुद्ध देवत्व की ओर बढ़ता है। यही वह सार तत्व है, जिसे कृष्ण ने गीता में प्रतिपादित किया है। पश्चिम में वैज्ञानिकों पर अक्सर यह दबाब डाला जाता रहा है कि वे धार्मिक ग्रन्थों की अवधारणाओं पर उंगली न उठाएं, उन पर प्रश्न न करें, जबकि इसके विपरीत भारत के अधिकांश धर्म ग्रन्थ सवाल-जबाब के रूप में ही लिखे हुए हैं। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी बात कहने के उपरान्त सुझाव देते हैं कि तुम स्वतंत्र रूप से इन बातों पर गौर करो और तुम्हें इस बात की पूरी आजादी है कि तुम इससे सहमति प्रकट करो या इन्हें ठुकरा दो। श्रीकृष्ण ने कहीं भी अपने विचार अर्जुन पर नहीं थोपे। साम्यवाद भी लगभग इन्ही विचारों का पोषक है, लेकिन कहीं कहीं सुनने में आता है कि इस विचारधारा को मानने वाले कुछ कट्टर लोग अपने से भिन्न विचारों को पसंद नहीं करते। विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट करने के साथ ही श्रीकृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को अत्याचारों को सहने की बजाय उनके विरुद्ध उठ कर युद्ध करने की प्रेरणा दी, जैसा कि कम्युनिस्ट भी अधिकतर करते हैं। उन्होंने अर्जुन को कहा कि इस युद्ध को विवेक बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए कर्तव्यरूप समझ कर लड़े, न कि गुस्से अथवा घृणा के साथ लड़े। साम्य वाद की जो खूबियां हैं, उसमें से एक है बंटवारा। अगर हम श्रीकृष्ण का बाल्यकाल देखें तो हम पायेंगे कि वह बचपन से ही बिना किसी भेदभाव के अपने ग्वाल-बालों के बीच माखन-मिश्री का बंटवारा करके खाते थे। बाद में उन्होंने सम्पत्ति का बंटवारा किया। साम्यवाद की सबसे बड़ी खूबी है कि बिना किसी भेदभाव के सम्पूर्ण समाज के हित में काम करना और यही श्रीकृष्ण ने भी किया। उनका मानना था कि जो मनुष्य वास्तव में बुद्धिमान है, वह समाज में किसी को ब्राह्मण एवं किसी को अछूत नहीं समझेगा। कम्युनिस्ट जातिवाद के सतत विरुद्ध है, परन्तु आप चाहे इसे पसंद करें अथवा नहीं परन्तु यह हर काल में किसी न किसी रूप में सर्वत्र व्याप्त है। यह जल्मजात भी है और मनुष्य द्वारा अपनाये गए कर्मों के अनुसार भी। ऐसे भी उदाहरण हमें मिल जायेंगे जिसमें कि किसी का जन्म तो किसी अन्य जाति में हुआ, लेकिन उसने अपने पर परागत धन्धे को न अपना कर अन्य कोई कार्य किया। उदाहरण के लिए हम वेद व्यास को लें, जिनका जन्म तो एक मछुआरे के यहां हुआ, लेकिन उन्होंने इतिहास प्रसिद्ध बड़े-बड़े धार्मिक ग्रन्थों की रचनाएं की। हमें आश्चर्य तो तब होता है, जबकि हम पाते हैं कि हमारे ज्ञात हजारों ऋषि-मुनियों में से कुछ लोग ही तथाकथित सवर्ण वर्ग के थे। यह दुख की बात है कि कुछ दिखावटी लोग जो साम्यवाद की बात करते हैं, लेकिन वे स्वयं आलीशान जिन्दगी जीते हैं, परन्तु श्रीकृष्ण ने कभी ऐसा नहीं किया.। वे स्वयं कभी राजा नहीं बने, हालांकि कुछ लोग उन्हें द्वारकाधीश पुकारते हैं। वे द्वारका के सेवक की तरह रहे। वे राजमुकट के बिना ही राजा रहे। उन्होंने सदैव गरीबों के हितों के लिए कार्य किया और आमजन में अपनी तस्वीर देखी, इसलिए सदियां बीत जाने पर आज भी वे याद किये जाते हैं, परन्तु आजकल अचानक रामायण, महाभारत इत्यादि को सिर्फ महाकाव्य, साहित्यिक रचना घोषित करने की बातें होने लगी हैं। कुछ लोग इन ग्रन्थों को कथा-कहानियों के रूप में लेने लगे हंैं, मानो इनमें वर्णित घटनाएं कोरी कपोल कल्पित हो। यह घारणा हास्यास्पद है क्योंकि सिर्फ पौराणिक कथा-कहानियों से सम्पूर्ण क्षेत्र और यहां तक कि देश-विदेश में भी बिना किसी प्रचार प्रसार के समुचित साधनों के, इनका प्रभाव देखा-सुना जा सकता है। रामायण एवं महाभारत का सम्पूर्ण सभ्यता पर इतना व्यापक प्रभाव एक आश्चर्य का विषय है। संस्कृ त के शब्द 'इतिहासÓ का तात्पर्य ही यही है कि ऐसा हुआ था, ऐसा हुआ है। संसार के प्रत्येक प्राणी को अपने समकक्ष मानना हृदय की बात है और हृदय की यह उमंग अध्यात्म से आ सकती है। यह कोरी विद्वता की बात ही नहीं है कि आपने पढ़ा और आप इस पर काम करने लगे, यह भावना की बात है और भावनाओं का विकास अध्यात्म से होता है। इसलिए एक सच्चा कम्युनिस्ट बनने के लिए यह आवश्यक है कि आपके हृदय में दया एवं प्रेम की लहर उमड़े। आधुनिक साम्यवाद धर्म के वर्तमान, कर्मकांडों की बाहुल्यता वाले स्वरूप को स्वीकार नहीं करता है और आपको शून्य में विचरण करने के लिए छोड़ देता है। अगर आप पर अध्यात्म का प्रभाव नहीं है तो आप अपने उदेश्यों से भटक जायेंगे और आप में प्रतिहिन्सा की ज्वाला प्रज्ज्वलित हो सकती है या आप में अवसाद-विषाद आ सकता है, जो कि आत्महत्या का रास्ता है। आप दूसरे किसी की तब तक सेवा नहीं कर सकते, जब तक कि आप उसे अपना नहीं मानें। सिर्फ अध्यात्म ही आपमें यह सेवाभाव, बांट कर सेवन करना अथवा साम्यवाद की भावना ला सकता है। साम्यवाद में इसी अध्यात्म की कमी है, जिसके लिए श्रीकृष्ण प्रसिद्ध थे, परन्तु अब यह देखा गया है कि कम्युनिस्ट केरल में गुरूवयूर मंदिर जाने लगे हैं और बंगाल में दुर्गा पूजा महोत्सव मनाने में भी झिझक नहीं दिखा रहे हैं।
श्री श्री रविशंकर-आर्ट ऑफ लिविंग हिन्दुस्तान टाइ स 13.6.2004 अनुवादक: शिव शंकर गोयल

गुरुवार, 2 जून 2011

अब मैं दादा हो गया हूं

जब मुझे स्टेट यानि अमेरिका, स्टैन्डर्ड बढ़ाने हेतु मैं अमेरिका को स्टेट ही कहता हंू, से मेरे पुत्र द्वारा खबर मिली कि मैं अब दादा हो गया हूं तो लगा कि जिन्दगी के सफर में सीनियरिटी की एक पायदान और चढ़ गया, वरना मेरी मां ने तो बचपन में मेरा घरेलू नाम छोट्या उर्फ छोटू रख कर मुझे सबसे 'जूनियरÓ ही बना डाला था। उस वजह से मैं ताजिन्दगी उसके लिए ही क्या, सब के लिए छुटकू ही रहा। यहां तक कि मुझे सरकारी नौकरी में भी किसी ने बड़कू अर्थात 'सीनियरÓ नहीं माना। खूब कोर्ट-कचहरियां कर लीं, कभी सर्विस ट्रिब्यूनल तो कभी कोर्ट, लेकिन नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात।
ऐसा कैसे हुआ, वह बातें अब आप न पूछें तो ही ठीक है वर्ना कहीं कुछ कह दिया तो कौन जाने कब मानहानि के दावे के लिए बुलावा आ जाए। यह तो भला हो बैंक और रेलवे का, जिसने बाद में 60 की उम्र में बिना कुछ कहे सुने मुझे 'सीनियर सिटीजनÓ मान लिया, वरना इन्कम टैक्स वाले तो मुझे 65 वर्ष का होने तक इंतजार करवाते रहे। केन्द्र सरकार एक और उसके दोनों विभागों के वरिष्ठ नागरिकता के नियम अलग-अलग, है ना मजेदार बात, लेकिन यही तो अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की खूबी है!
जब मैंने अपने बचपन के लंगोटिया दोस्त को टेलीफोन पर यह बात बताई कि अब मैं दादा हो गया हूं तो पहले तो वह मानने को ही तैयार नहीं हुआ फिर उसने फोन पर ही मुझे कहा कि तू कभी सुधरेगा या नहीं। इस उम्र में दादागिरी करने की सूझी है? पुलिस को पता लगा तो फिर क्या होगा। मैं उसे बता ही रहा था कि यह बात नहीं है, लेकिन वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह बोलता रहा कि बस-बस रहने दे। यह उम्र भगवान का नाम लेने की है और तू दादा बन रहा है, कहीं पुलिस ने थाने में बुलवा लिया तो रही सही इज्जत भी मिट्टी में मिल जानी है। घबरा कर मैंने फोन बंद कर दिया।
हां, तो मैं आपको दादा बनने के बारे में बता रहा था। जैसा कि आप स्वयं जानते हैं कि बचपन में बनी धारणा अथवा संस्कार आसानी से नहीं जाते। एक बार जब मैं पांचवी-छठी क्लास में पढ़ा करता था तब हमारे एक सहपाठी के बारे में सुना कि वह दादा बन गया है, परन्तु हम में से कइयों को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ, हालांकि हम उसे देखा करते कि वह अक्सर गले में रुमाल बांधे रखता, कभी कमीज अथवा बुशर्ट की कॉलर ऊपर चढ़ाए रखता अथवा उनके ऊपर के एक-दो बटन खुले रख कर घूमा करता। इतना ही नहीं, चलते वक्त हाथों को दोनों ओर फैलाए रखता तथा हरदम लडऩे-झगडऩे को आतुर रहता था। फिर भी हममें से कइयों ने उसे 'दादाÓ की मान्यता नहीं दी, लेकिन एक रोज किसी बात पर मास्साब ने उसकी खूब पिटाई की तो 'कन्फर्मÓ हो गया कि वह वाकई दादा है क्योंकि कहावत है कि 'दादा, मार खावै ज्यादा।Ó यह बात अलग है कि वह मार घर पर, स्कूल में या थाने पर, इनमे से कहां ज्यादा खाता है। दादा लोग सिर्फ दादा ही नहीं कहलाते, 'दादागिरÓ भी कहलाते हैं। इनका पुलिस और नेताओं से सीधा संबंध होता है। जैसे जनप्रतिनिधियों के अपने-अपने क्षेत्र होते हैं, इनके भी अपने इलाके होते हैं, जहां यह रंगदारी, पैसा ऐंठना इत्यादि का कार्य अंजाम देते रहते हैं। कहीं-कहीं चुनाव के दिनों में भी इनकी सेवाएं ली जाती हैं। अक्सर यह लोग माफियों और नेताओं के साथ काम करते हैं। इनकी वजह से उपरोक्त पुरानी कहावत 'दादा, मार खावै ज्यादाÓ धीरे-धीरे पुरानी पड़ती जा रही है और इसकी जगह 'दादा, माल खावै ज्यादाÓ का प्रचलन बढ़ रहा है। तभी तो हम देश के राजनीतिक दृश्य पटल पर नेताओं, अफसरों एवं कतिपय पत्रकारों के साथ-साथ असरदार लोगों, दादाओं के कारनामे देख रहे हैं, जो देश को चूना लगाने में एक-दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। भगवान जाने कब ऐसे दादाओं से देश को निजात मिलेगी? इसलिए जब से मैंने यह सुना कि अब मैं दादा हो गया हंू तो मैं सोचता रहता हूं कि यह काम मैं कैसे कर पाऊंगा? मैं डर रहा हूं कि अब मैं क्या करूंगा? मेरे से तो यह सब होगा नहीं। मैं कमीज बुशर्ट के बटन खोल कर कैसे घुमूंगा? मैं बिना पुलिस की मदद के दादा कैसे बनूगां और फिर मेरा तो कोई राजनीति में गॉडफादर भी नहीं है, इसलिए इस बात को छिपाता फिर रहा हूं, लेकिन बीबी-बच्चे समझा रहे हैं कि आपको मूल का ब्याज मिला है। उनका कहना है कि दादा शब्द तो आदर का है। इसे घर-परिवार में जहां पिता के पिता के लिए इस्तैमाल किया जाता है, वहीं यह कहीं-कहीं बड़े भाई के लिए भी प्रयुक्त होता है। महाराष्ट्र में तो इस नाम-पदवी के साथ कई विभूतियां हुई हैं, जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा भाई नौरोजी, न्यायाधिकारी दादा धर्माधिकारी, फिल्मों के दादा फाल्के, जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। यहां तक कि वहां के मुख्यमंत्री तक बसंत दादा पाटिल हुए हैं, इसलिए कहीं-कहीं दादा शब्द सम्माननीय भी है और जहां दादा का सम्मान है, वहां भला दादी कैसे पीछे रह सकती है। अत: कई पारिवारिक पत्रिकाओं ने अपने अपने पृष्ठों में 'दादी मां के नुस्खेÓ नामक लोकप्रिय स्तम्भ चलाए हुए हैं। अत: आपका यह छिपाव करना गलत है। वे कहते हैं कि 'कहीं कुलड़ी मेंं गुड़ फूटा हैैंÓ अर्थात कहीं कोई ऐसी बात छिपी रही है? लगता है इस बहाने आप इष्ट मित्रों को मिठाई खिलाने से बचना चाहते हैं, परन्तु मेरा कहना है कि ऐसा नहीं है, है ना?
यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333

पाराशर जी का चौथा विकल्प

जय भगवान जी का पूरा नाम जय भगवान पाराशर था। वे पुष्कर के रहने वाले थे और हमारे ही मकहमे यानि पीएचईडी में लिपिक के पद पर काम करते थे, परन्तु किसी के पूछने पर पीएचडी ही बतलाते। मेरी उनसे पहली मुलाकात विभाग में ही हुई थी। हम एक ही सैक्शन में थे। अक्सर उनकी बातें बड़ी दिलचस्प होती थीं। एक रोज की बात है कि हमारे ही विभाग का कोई कर्मचारी अपने तबादले हेतु भीलवाड़ा से हमारे कार्यालय अर्थात मुख्यालय जयपुर आया। उसे लेकर हम सभी कार्यालय के बाहर किशन चाय वाले की थड़ी पर पहुंचे। किशन को चाय का ऑर्डर देने के बाद सामने ही कड़ाही में गर्मा-गर्म कचौरियों को तैयार होते देख कर उनका जिक्र चल पड़ा। सभी कचौरियों के बारे में बातें करने लगे। तभी पाराशर जी ने रहस्योद्घाटन किया कि एक बार वे 72 कचौरियां तक खा चुके हैं। उनका यह दावा सुन कर हम सभी एकाएक शंका करने लगे और उन्हें कहा कि एकबारगी में 72 कचौरियां खाना नामुमकिन है, लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और कहा कि वाकई मैंने 72 कचौरियां ही खाई हैं। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने यह भी बताया कि यह बात अजमेर की मशहूर चाट की दुकान विद्या कचौरी वाले की है। हम सभी द्वारा पाराशर जी के दावे को खारिज होते देख थोड़ी देर बाद वह कुछ नरम पड़े और अपना क्लेम कुछ ढीला कर दिया और कहा कि 72 नहीं तो 60-65 तो थी ही, इससे कम का तो सवाल ही पैदा नही होता। हमारे ही एक साथी ने जब उन्हें चैलेंज किया और कहा कि एक साथ 60-65 कचौरियां भी खाना सम्भव नहीं है और अगर वह फिर से खाकर दिखा दे तो वे उन्हें 100 रुपए देंगे और अगर नहीं खा सकेंगे तो दुगने पैसे देने पडेंगे। उस समय 100 रुपए की कीमत होती थी। इतने में ही चाय आ गई और हम लोग चाय पीने लगे। कुछ देर बाद हम सबने मिल कर फिर उन्हें ललकारा तो पाराशर जी कहने लगे कि इस बाबत आप चाहें तो जगदीश जी से भी पूछ सकते हैं। ऊपर मैं आपको यह बताना भूल गया था कि हमारी उक्त गोष्ठी में पाराशर जी के परम मित्र जगदीश जी भी मौजूद थे, जो इस वार्ता के दौरान अधिकांश समय मुस्करा रहे थे। जब पाराशर जी ने 40 का आंकड़ा फिर दोहराया और कहा कि जगदीश जी ने स्वयं गिनी हैं। यहां पर कनखियों से मैंने देखा कि जगदीश जी आंख मार कर पाराशरजी को कुछ और कम करने के लिए इशारा कर रहे हैं। इस पर पाराशर जी बिफर पड़े और कहा कि मैं अब और कम नहीं कर सकता क्योंकि अब तो कचौरियां गिन भी ली गई हैं। तभी चपरासी ने आकर बताया कि पाराशर जी को साहब याद कर रहे हैं तो हम सब दफ्तर की तरफ चल दिए और इस तरह उस दिन अनिर्णित बहस का समापन हुआ।
पाराशर जी के बारे में कई किस्से मशहूर थे। कहते हैं कि उनकी युवावस्था में जब वह शादी के लायक थे तब कई लोग उन्हें देखने, उनके बारे में जानकारी लेने आते थे। इस बारे में जगदीश जी ने एक सच्ची घटना सुनाई। हुआ यह कि एक रोज कुछ लोग शादी का प्रस्ताव लेकर उन्हें देखने-जानने आए। मुलाकात किसी जानकार के घर पर हुई। औपचारिक भेंट एवं नाम इत्यादि पूछने के बाद उनसे पूछा गया कि बेटा! कितना पढ़े हो, तो उन्होंने जबाब दिया कि एमए साइंस हूं। लड़की वालों ने फिर पूछा कि क्या करते हो, कोई दुकान है या नौकरी है, तो उन्होंने जवाब दिया कि पीएचडी में हूं। अपना कोई मकान वगैरह भी होगा, इस पर यह बोले कि दो-दो कोठियां हैं। एक मोदियाना गली में है दूसरी रक्त्या गली में। उम्र कोई बीस- बाईस होगी, मैं 35 साल का हूं। इतने में इनको खांसी आ गई तो लडकी वालों ने प्रसंगवश पूछ लिया कि क्या खांसी है, तो यह बोले कि नहीं, दमा है। कहने का तात्पर्य यह कि हर बात को अपने ही ढंग से बढ़ा-चढ़ा कर कहने की आदत पाराशर जी की थी। विभाग में काम करते-करते जब काफी अर्सा हो गया तो उनकी बातों में परिपक्वता आने लगी। एक बार दफ्तर समय में साथियों के बीच धूप सेकते-सेकते बात चल पडी तो उन्होंने अपनी युवावस्था का एक किस्सा सुनाना शुरू कर दिया।
यह बात आप उन्ही के शब्दों में सुनेंगे तो ज्यादा आनंद आयेगा। एक बार हम कुछ दोस्त गोठ करने पंचकुंड, जो कि पुष्कर के पास नाग पहाड की तलहटी में स्थित महाभारतकालीन ऐतिहासिक स्थल जो कभी घने वन से घिरा रहता था, गए। वर्षा ऋतु में कोई छुट़टी का दिन था। गोठ का जरूरी सामान लेकर हम वहां पहुंचे और हममें से कुछ लोग रसोई बनाने में जुट गए, कुछ लोग नहाने-धोने में पांचों कुन्डों की तरफ निकल गए। मैं अपने एक दोस्त के साथ जंगल में बरसाती नाले की तरफ चला गया। बातों ही बातों में हम काफी दूर निकल गए और नाले के एक किनारे स्थित टीले पर बैठ कर बातें करने लगे। बातों में हमें यह भी ध्यान नहीं रहा कि कुछ देर पहले जंगल के पशु-पक्षी अपनी अपनी बोलियों में चिल्ला कर कुछ संकेत कर रहे थे। थोड़ी देर बाद बिलकुल सन्नाटा छा गया। इतने में हमने देखा कि एक शेर चारों तरफ देखता हुआ धीरे-धीरे नाले की तरफ बढ़ रहा है। वह स्थान हमारे बैठने के स्थान के ठीक सामने ही था। सिर्फ कुछ झाडिय़ां ही हमारी ओट बनी हुई थीं। शेर को इतना करीब देख कर एकबारगी तो हमारी सांसें ही जैसे थम गईं, लेकिन दम साधे हम लोग बैठे रहे। इतने में एक काले मुंह के बंदर ने हूप-हूप की आवाज करते हुए एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाई ,जिससे अचकचा कर शेर पीछे मुड़ कर जंगल की तरफ भागा। इधर हम दोनों भी अपनी जान बचा कर पुष्कर की तरफ भाग आए। पाराशर जी ने उपरोक्त किस्सा कोई एक बार ही हमें नहीं सुनाया, एक और मौके पर उन्होंने इसी घटना को विस्तार से फिर सुनाया, मानो कोई नई बात सुना रहे हों। हां, उसका उत्तराद्र्ध यानि बाद का हिस्सा बदल दिया। हो सकता है ऐसा उन्होंने अनजाने में कर दिया हो क्योंकि ऐसी घटनाएं दुबारा सुनाते वक्त अक्सर वक्ता को यह याद नहीं रहता कि पहले क्या सुनाया था? खैर, दूसरी बार सुनाते वक्त उनका कहना था कि शेर जब पानी पी चुका, तभी अचानक कहीं से टिटहरी की आवाज हुई, जिसे सुन कर शेर चौंक गया और उसने हमारी ओर देखा। यह दृश्य देख हमारे होश उड़ गए और हम दोनों सिर पर पांव रख कर वहां से भागे तो पुष्कर की बड़ी बस्ती में आ कर ही दम लिया। एक और अवसर पर यही किस्सा तीसरी बार सुनाते वक्त उनका बाद वाला विकल्प फिर बदल गया। इस बार उनका कहना था कि जब शेर पानी पी चुका तो अचानक एक कव्वे की आवाज सुनाई दी, जिसे सुनकर शेर चौकन्ना हो गया ओर वह जंगल की तरफ भागा और इधर जान बचा कर हम भी भागे और पुष्कर की छोटी बस्ती में आकर ही दम लिया। यानि इस बार दोनों ही पक्ष विपरीत दिशाओं में पलायन कर गए।
मैं कई बार यह सोचता रहता हंू कि कहीं पाराशरजी को एक बार और शेर मिल जाता तो उनका चौथा विकल्प, यानि दोनों ही भागने की बजाय आमने-सामने हो जाते, तो क्या होता? परन्तु हमारे देश में तो हर कोई तीसरे विकल्प तक ही आकर ठहर जाता है। चाहे राजनीति हो चाहे जैन्डर भेद यानि स्त्रीलिंग-पुल्लिंग एवं शबनम मौसी वाला वर्ग। इससे आगे कोई बढ़ता ही नहीं। मेरा मानना है कि पाराशर जी के साथ चौथा विकल्प हो जाता तो शायद वही होता जो एक अन्य व्यक्ति के साथ हुआ। हुआ यह कि एक बार वह व्यक्ति घने जंगल के बीच से गुजर कर कहीं जा रहा था कि उसका सामना एक शेर से हो गया। फिर तुमने क्या किया, मित्र ने पूछा। मुझे क्या करना था, जो कुछ करना था उस शेर को ही करना था। वह बोला, खुदानखास्ता ऐसी बात पाराशर जी के साथ हो जाती तो वे मुझे कैसे बताते और जब वे मुझे नहीं बताते तो मैं भी फिर आपको क्या सुनाता?

यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333

द्वारका विच रैयाही नही, उनानै दिल्ली रैणदा मजा नहीं चख्या!

यह तो मेरी किस्मत अच्छी थी, जो मुझे द्वारका में आकर रहने का मौका मिला वरना, जिन्दगी में मलाल ही रह जाता। वैसे यहां आकर रहने में यह फायदा है कि आपका स्टैन्डर्ड बढता है। यहां आने से हिन्दुओं के चार धामों- बद्रीनाथ, पुरी, रामेश्वरम और द्वारका में से एक की यात्रा अपने आप ही हो जाती है। एक ओर जहां देश के छोटे-छोटे शहरों, कस्बों में जब कभी कोई हवाई जहाज आकाश में आवाज करता हुआ निकलता है तो बच्चे-बूढ़े सभी आकाश की ओर कौतुहल एवं हसरत भरी निगाहों से देखने लगते हैं, लेकिन यहां द्वारका में रहने वाले तो सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें रोजाना ही हर दस-बीस मिनट में एक हवाई जहाज उतरता या चढ़ता हुआ दिखाई दे जाता है। इसलिये लोग तो कहते हैं कि यहां के निवासी किस्मत वाले हैं। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्री कृष्ण भी द्वारका में ही जाकर रहने लगे थे।
यहां ऊंचे-ऊंचे अपार्टमेन्ट्स हैं, जिनके भाव भी ऊंचे हैं और उनके किराये भी ऊंचे हैं। वैसे सरकारी विभागों की मेहरबानी से अधिकांश फ्लैट खाली पड़े हैं। यहां खाने-पीने की चीजों के भावों का अन्दाजा आपको एक बात से लग जायगा। एक बार मैं एक बाजार में एक किरयाने की दुकान पर दालों के भाव लगे देख कर सहम गया। दालें अब किलो के हिसाब से नहीं, बल्कि उनके दाने नग के हिसाब से मिल रहे थे। उदाहरणार्थ अरहर, दाल के दाने दो रुपए दर्जन, मूंग छिलका डेढ़ रुपए दर्जन इत्यादि। यह देख कर मैं घबरा कर आगे बढ गया। फल-सब्जी वाले भी किसी तरह कम नहीं हैं। थोक मंडी से यहां लाते-लाते उनके भाव चौगुने कर देते हैं। पिछले मंगलवार को जब मैं साप्ताहिक सब्जी मंडी गया तो यह देख कर हैरान रह गया कि पालक-मेथी के पत्ते तक गिनती से मिल रहे हैं। मसलन पालक एक रुपए के 5 पत्ते, मेथी एक रुपए के बीस पत्ते इत्यादि-इत्यादि। और जब चलते-चलते एक ठेले वाले से पूछा कि नींबू क्या भाव दिए तो वह बोला बीस रुपए के चार। मैंने उसे कहा भाई! कुछ कम करो तो वह बोला-अच्छा साÓबजी! बीस रुपए के तीन ले जाओ। आस-पास खड़े सभी हंस दिये और मैं भी खिसियानी हंसी हंस कर आगे बढ़ गया।
जानकार लोग बताते हैं कि आम जरूरत की चीजों के भाव बढ़ाने में जहां केन्द्र की सरकार का 'हाथÓ है तो वहीं दिल्ली की 'लोकप्रियÓ सरकार भी इसमें अपना 'हाथÓ बंटा रही है और मजे की बात देखिए कि इस बढ़ती महंगाई से लोगों का ध्यान हटाने हेतु यह लोग तरह-तरह के दूसरे मुद्दे उछालते हैं। द्वारका में बड़े-बड़े 'इन्टरनेशनलÓ स्कूल भी हैं। इन स्कूलों की फीस भारी भरकम होती है। अलबत्ता अधिकांश बच्चों को माक्र्स 90 प्रतिशत से अधिक ही मिलते हैं, चाहे वह पढऩे में कैसा ही हो। यहां कई संस्थाएं इन्टरनेशनल हो रही हैं, जिनके अध्यक्ष-उपाध्यक्ष सब इन्टरनेशनल हैं। दिलचस्प है कि एक मेट्रो स्टेशन के पास पेड़ के नीचे एक नाई ने अपने सैलून का नाम ही 'इन्टरनेशनल कटिंग सैलूनÓ रख दिया है। यहां के अधिकांश सैलून भी अन्तर्राष्ट्रीय हैं क्योंकि उनके रेट्स भी उसी स्तर के हैं।
डीडीए द्वारा स्थापित इस उपनगरी में हर चीज ऊंची यानि भारी है। अब आप पीने के पानी को ही लें। यहां का पानी भी गुणों में बहुत भारी है। अगर तकनीकी भाषा में कहे तो इसका टीडीएस अर्थात टोटल डिजोल्वड सोलिड दिल्ली के किसी भी क्षेत्र के मुकाबले कहीं ज्यादा है। उसकी वजह से सरकार का जल बोर्ड डर के मारे इधर तो कुछ कर नहीं रहा, बल्कि 'यमुना में जान डालनेÓ का अभियान चला रहा है। यहां के निवासियों का भी स्टैन्डर्ड कोई कम नहीं है। यहां सभा-सोसाइटी में 'फाइनलÓ शब्द को 'फिनालेÓ ही बोला जाता है।
आसपास के क्षेत्रों से अथवा बाहर के किसी प्रान्त से आकर यहां बसने वाले जयकिशन नामक व्यक्ति यहां आते आते मि. जैक्सन हो जाते हैं और बात-बात में इंगलिश बोल कर अपने हाव-भाव दर्शाते हैं। जाहिर है कि बिना नाम बदले स्टैन्डर्ड कैसे बढ़ेगा? कहना पड़ेगा कि जहां दिल्ली का कतिपय इलाका 'ल्यूटियंस जोनÓ कहलाता है तो द्वारका कम से कम 'लुटियन जोनÓ तो है ही। आप भी मानते हैं ना?
और अधिक आपको क्या बतायें, आदमी तो आदमी यहां मच्छरों तक की साइज भी अपेक्षाकृत और जगहों से बड़ी है। कद-काठी में कोई इनसे टक्कर ले सकता है तो तराई इलाके के मच्छर ही ले सकते हैं। इसलिए यहां के लोगों को बीमारियां भी बड़ी-बड़ी ही होती हैं। किसी को सर्दी-जुखाम नहीं होता। या तो डेंग्यू होगा या कोई ज्यादा माडर्न हुआ तो उसे स्वाइन फ्लयू होगा। यहां बुखार होने पर किसी को भी टैम्प्रेचर 104-105 से कम नहीं होता। इन बीमारियों के मुकाबले हेतु आस पास बड़े-बड़े इंटरनेशनल निजी अस्पताल हैं, जहां कहते हैं कि मरीज को बिना क्लोरोफार्म सुंघाए ही ऑपरेशन किए जाते हैं। पूछने पर एक जानकार ने बताया कि इसके लिए उनके पास सीधा सा तरीका है। वह ऑपरेशन टेबल पर ही मरीज को बिल पकड़ा देते हैं, जिसे देखते ही वह बेहोश हो जाता है यानि बिना हींग-फिटकरी लगे ही रंग चौखा आ जाता है।
खुशी की बात यह है कि यहां के अधिकांश लोग खुशमिजाज हैं और जिनके पास बाइक या कारें हैं, वह अधिकांशत: तेजी से दौड़ाते हैं क्योंकि कोई रोक-टोक करने वाला नहीं है। जैसे एक विशेष ब्रांड के च्यवनप्राश में सोना-चांदी की कमी नहीं होती है, यहां द्वारका में भी 'सोनाÓ 'चांदीÓ की कमी नहीं है। जहां पुलिस वालों का ध्यान अपराधों की रोकथाम की बजाय थाने में 'सोनेÓ की तरफ है, वहीं दूसरी ओर चोरों एवं झपटमार बाइक सवारों की 'चांदीÓ हो रही है।
यह व्यंग्य लेख सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री शिवशंकर गोयल ने भेजा है। उनका संपर्क सूत्र है -फ्लेट नं. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी, प्लाट नं. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75, मोबाइल नंबर: 9873706333