रविवार, 15 जनवरी 2012

कल कह ना सकूं


कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
रात सोऊँ सवेरे उठ
ना पाऊँ
इस तरह दुनिया से
रुखसत होना चाहता हूँ
सबको हँसते गाते
छोड़ कर जाना चाहता हूँ
जानता हूँ जब भी कोई
अपना जाता
दिल कितना रोता है
किसी अपने को
रुलाना नहीं चाहता हूँ
याद कर
आंसू ना बहाए कोई
जाने के बाद किसी को
याद नहीं आऊँ
ज़िन्दगी के सफ़र में
मिला था मुसाफिर कोई
समझ कर
भुला दिया जाऊं
दुखाया हो
दिल किसी का कभी
हुयी हो गलती कोई
तो जीते जी
माफ़ कर दिया जाऊं
जाने के बाद
दिल किसी का दुखाना
नहीं चाहता हूँ
दे नहीं सका खुशी जिन्हें
उन्हें खुश देखना
चाहता हूँ
बना ना सका अपना
जिन्हें
उन्हें अपना बनाना
चाहता हूँ
बचे वक़्त का हर लम्हा
दूसरों के लिए जीना
चाहता हूँ
कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
सुकून से जाना
चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181

मैं खडा होना चाहता हूं, व्यंग्य


अब मैं भी खडा होना चाहता हंू। नहीं, आप गलत समझ गए। मैं अपने
पेैरों पर तो पहले से ही खडा हूं। मैं तो चुनाव दंगल में खडे होने के लिए कह
रहा हंू। कहते हैं कि खडे होने का अनुभव या तो मंत्री को होता हैे या संतरी
को, लेकिन उं-हंू, मेरे को यह बात नही जंचती। अब मुझे ही लो, मुझे खडे होने का क्या कम अनुभव है? बचपन में पढने लिखने में ठोठ, कमजोर था,
पंडितजी पहाडे याद नहीं करने पर खूब मारते थे, बैंच पर खडा कर देते थे,
फिर घंटों खबर नहीं लेते कि मैं खडा ही हंू या कहीं बैठ तो नहीं गया? मेरी
पढाई से ज्यादा खडे रहने की तरफ जब ध्यान दिया जाने लगा तो मैंने रो-
धो कर स्कूल बदल ली, लेकिन यहां भी मास्साब मेरी खूब खबर लेने लगे। सलेख नहीं लिखने पर डंडों से पिटाई करके बाहर धूप में खडा कर देते थे, इसलिए बचपन से ही मुझे खडे होने का अच्छा खासा अनुभव है और आप जानो पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं, बचपन से ही जिसने खडे होने का इतना अनुभव ले लिया हो वह कहां खडा नहीं हो सकता? मास्साब भी कहते थे
बडा होकर यह या तो मंत्री बनेगा या संतरी। खैर,
थोडा बडा हुआ तो मां थैला पकडा कर राषन की दुकान पर भेज देती।
वहां घंटों खडे रहने का अनुभव मिला। वहां जब भी जाते दुकान बंद मिलती
और कभी भाग्य से दुकान खुली मिल भी जाती तो घंटों खडे रहकर इंतजार
करना पडता और जब नम्बर आ भी जाता तो या तो कचरा मिला गेंहू अथवा
गीली षक्कर या मिलावट का कैरोसीन खत्म हो चुका होता। अक्सर राषन की
दुकानवाले के पास रेजगारी भी नहीं होती थी और वह बात-बात में झल्लाता
तथा दुर्व्यवहार करता था। बहरहाल घंटों लाइन में थैला लटकाए खडे होने का
अनुभव तो है ही, कहीं आप यह न समझ लें कि अनुभव नहीं है। इसी तरह पास के मोहल्ले में लगे हैंडपम्प पर पानी भरने जाते थे तो वहां काफी देर खडे रहते क्योंकि पहले तो मोहल्ले के दादा लोग पानी भरते फिर जिस व्यक्ति का मकान हैंडपम्प के पास होता वह उसे अपनी जागीर होने की धौंस बताता और जिसे वह अपना समझता उसे पहले पानी भरवाता, लिहाजा घंटों खडे रहते।
ऐसे कई अनुभव बचपन और किषोरावस्था के हैं। चंद उदाहरण आपको
यह बतलाने के लिए लिखें है कि सनद रहे और वक्त बेवक्त आप भी गवाही दे
सकें कि मुझे खडे होने का अनुभव है।
युवावस्था में पैर रखा तो कभी कभार थर्ड क्लास में सिनेमा देखने भी
चले जाते थे, वहां साढे तीन बजे के षो देखने के लिए 2-3 घन्टे पहले से ही
लाईन लग जाती थी, उस लाइन में घंटों खडे रहते तब कहीं धक्का-मुक्की
खाते-खाते टिकट हाथ आता, कभी नहीं भी आता क्योंकि ब्लैक वाले दादाओं का ज्यादा जोर था औेर उन्हें पुलिस का संरक्षण था। यों खडे रहने का अनुभव
षादी के अवसर का भी है। ससुराल में तोरण मारने के बाद वहां दरवाजे के
बाहर काफी देर खडे रहे ताकि हमारी भावी पत्नी आकर वर माला डाल दे, लेकिन वह अपने हिसाब से आई। फिर जब घर गृहस्थी में पड गए तो आटा-दाल का भाव भी मालुम हो
गया और नौकरी के लिए भर्ती दफतर में नाम लिखवाने गए और वहां जो
लाइन में खडे हुए तो बस हद हो गई। सुबह से लगे लोगों को षाम तक किसी ने यह नहीं पूछा कि क्यों खडे हो?
घन्टों खडे रहने की बातें तो बिजली-पानी के बिल जमा कराने जाता हंू
तब की भी बहुत हैं, लेकिन जो अनुभव कोर्ट कचहरी का है, उसे आपको क्या
सुनाउं ओैर क्या नही सुनाउं? वहां ठेठ गांव वाला क्या ओैर अच्छे से अच्छा
पढा लिखा तीस मारखां क्या, सभी घंटों खडे रहते हैं, तब कही जा कर अचानक पता लगता हैें कि कोई तारीख पड गई हैं, कोर्ट कचहरी में कटघरे के अन्दर चाहे बाहर अगर आप कहीं भी खडे रहे हैं तो आपको किसी और अनुभव की जरूरत नही है। आप कहीं भी खडे हो सकते हैं।
खडे होने का अनुभव उन सभी को है, जो कोई भी अपनी षिकायत या
अपनी मुसीबत लेकर किसी सरकारी दफतर गया हो तो वहां घंटों खडे रहना
पडता हैं, कोई कहता है वहां जाओ कोई कहता हैं वहां जाओ और आप घूमते
रहो जैसे मेले में पुलिसवाला और ग्रहण चन्द्र ग्रहण सूर्यग्रहण में थोरी
मांगने वाला घूमता है।
खडे रहने का एक रिकार्ड कानपुर के ‘धरती पकड’ का भी रहा है। वे कई
सालों तक चुनाव में खडे होते रहे, खडे रहने का एक रिकार्ड षाहजंहापुर के
स्वामी मांजगीर का भी है, वे सन 1955 से 1973 यान 18 साल तक ‘हठ
योग’ में खडे ही रहे। मैं इतना मुकाबला तो नही कर सकता लेकिन अगर यह
महानुभाव इस दफा खडे नही होते है तो किसी न किसी राजनीतिक दल द्वारा
मुझे अवसर दिया जाना चाहिए।
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 98737063339

शनिवार, 14 जनवरी 2012

भारत क्या है?

भारत देश विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह बात हमें खुशी देती है। चाहें हम भौतिक प्रगति की बात करें या वैज्ञानिक प्रगति हर ओर हम बुलंदी के झंडे गाड़ रहे हैं। अर्थ के क्षेत्र में भी भारत ने स्वर्णिम सफलाताएं पायीं हैं। अगर इसी प्रगति को आधार मानें तो भारत जल्द ही विश्वगुरु की ख्याति पुन: प्राप्त करने की राह पर अग्रसरित है। हमारे के लिए यह गर्व का विषय होगा क्योंकि हम सदियों तक दासता की बेडिय़ों में जकड़े रहे। कितनी शहीदों की कुर्बानी के बाद हम आजाद हुए। लेकिन यह सोचनीय विषय है कि इस भौतिक प्रगति को आधार मानकर क्या हम अपनी मौलिकता नहीं खो रहे? इस दिखावे की प्रगति को ही सर्वस्व मान लेना हमारी संस्कृति में नहीं रहा। हमने हमेशा जि़न्दगी के उत्तम सोपानों को ही आधार माना है। यही हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है कि हम जीवन के आधार सूत्र देने वाले अपने वेदों, उपनिषदों जैसे ग्रंथों को भूलकर कामनी काया के फेर में फंसे हैं।

हमने ज्ञान के क्षेत्र में हमेशा हर देश को मात दी, फिर ऐसा क्या हुआ कि भौतिकता ज्ञान पर हावी हो गई? पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण ही हमारा आधार बन गया। उनसे अच्छाई ग्रहण करने के बजाय हमने उन्हें अपना लीडर मान लिया। ऐसा लगता कि यह कमाल उस शिक्षा पद्धति का है जो अंग्रेजी शासन दंश रूप में भारत को दे गया। जिसके चलते हमने भारतीयता को त्याग दिया और अपनी संस्कृति को भुलाकर हम उस पर गौरव करना भूल गए। स्थिति यह है कि कहीं भी जाइए इस गुलामियत के शिकार हमें खोजने नहीं पड़ेंगे।

इन्हीं सब कारणों के चलते आज जरूरत महसूस की जा रही है कि हमें भारतीय मूल्यों को पुन: स्थापित करना होगा। इसके लिए जरुरत है उस क्रांतिकारी कलम जो आजादी का सपना देखती है और उसमें कामयाबी पाती है। जरुरत है ऐसी लेखनी की जिसका सहारे कामयाबी के मायावी दलदल से निकलकर सच्चाई सफलता की ओर बढ़ें। यही क्रांतिकारी सोच दिखती है सलिल ज्ञवाली की पुस्तक ‘भारत क्या है’ में। इस पुस्तक में भारतीय सोच और व्यापकता से प्रेरित शीर्ष वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, और संतों के वाणी का संकलन है। जिसकी उपयोगिता को वर्णित करना कठिन है। भारत ज्ञान का वह तहखाना है जिसके अंदर छिपे रहस्यों को आज तक जाना नहीं जा सका है। हमारी ऋषि सत्ताओं ने इसी पर शोध किया और भारत की महानता को प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित किया। भारत में प्रकृति से ज्ञान की धाराएं बहती हैं, जो हमें सत्य लक्ष्य की ओर अग्रसरित करती हैं। ज्ञान का संबंध हमेशा से प्रकृति के साथ रहा है। इसलिए प्रकृति के माध्यम से इसे सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। ऋषियों ने इसीलिए प्रकृति को प्रयोगशाला मानकर तरह-तरह के प्रयोग किए हैं। जिससे उन्होंने प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलकर आत्म निर्वाण प्राप्त करने का मंत्र दिया।
भारत किसी देश या क्षेत्र का नाम नहीं है। भारत, मन की उस स्थिति को कहते हैं जहाँ मनुष्य का चित्त आत्मिक प्रकाश से भरा हो, और वह सतत्-संतुष्ट हो। इस अध्यात्मपरक ज्ञान के अतिरिक्त हमने विज्ञान के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व खोजें की। हमने जीरो दिया, आयुर्वेद का ज्ञान दिया। भारत ने समस्त विश्व को जो नेमतें दीं, उन्हें अगुलियों पर नहीं गिना जा सकता।


आज के इस युग में भारतवासियों को भारत के बारे में बताना सच में चुनौती पूर्ण कार्य था। सलिल जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया। अपने शोध, कठिन परिश्रम और लगन की बदौलत एक ऐसी पुस्तक हमारे समक्ष प्रस्तुत जो हमें भारतीय होने का गर्व करा सके और हमें बता सके कि भारत क्या है? यह पुस्तक विश्वस्तर पर ख्याति पा चुकी है। इस अनुपम पुस्तक में सलिल जी ने पाश्चात्य विचारकों, वैज्ञानिकों के साथ ही भारतीय विचारकों के कथन का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की है कि जिस सनातन संस्कृति के ज्ञान को हम श्रद्धा के साथ आत्मसात करने में हिचकते है वही ज्ञान पाश्चात्य जगत के महान वैज्ञानिकों, लेखकों और इतिहासकारों की नज़रों में अमूल्य और अमृत के सामान है. कितने आश्चर्य की बात है कि आज हम उसी ज्ञान को भुला बैठे हैं।

लेखक की अद्भुत कृति में आइन्स्टीन, नोबेल से सम्मानित अमेरिकन कवि और दार्शनिक टी एस इलिएट, दार्शनिक एलन वाट्स, अमेरिकन लेखक मार्क ट्वेन, प्रसिद्ध विचारक एमर्सन, फें्रच दार्शनिक वोल्टायर, नोबेल से सम्मानित फें्रच लेखक रोमा रोला, ऑक्सफोर्ड के प्रो$फेसर पाल रोबट्र्स, भौतिक शास्त्र में नोबेल से सम्मानित ब्रायन डैविड जोसेफसन, अमेरिकन दार्शनिक हेनरी डेविड थोरो, एनी बेसंट, महान मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग के साथ भारतीय विचारकों जैसे अब्दुल कलाम के विचारों को आप पढ़ और समझ सकते हैं। इतना तो स्पष्ट है किताब को पढने के बाद जिन प्राचीन ऋषि मुनियों की संस्कृति से दूरी बनाये रखने को ही हम आधुनिकता का परिचायक मान बैठे हों उस के बारे में हमारी धारणा बदले।
इस पुस्तक को पढऩे पर हम पाएंगे कि आइन्स्टीन कह रहे हैं कि हम भारतीयों के ऋणी हैं जिन्होंने हमको गणना करना सिखाया जिसके अभाव में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें संभव नहीं थी। वर्नर हाइजेनबर्ग प्रसिद्ध जर्मन वैज्ञानिक जो क्वांटम सिद्धांत की उत्पत्ति से जुड़े हैं का यह कहना है कि भारतीय दर्शन से जुड़े सिद्धांतो से परिचित होने के बाद मुझे क्वांटम सिद्धांत से जुड़े तमाम पहलु जो पहले एक अबूझ पहेली की तरह थे अब काफी हद तक सुलझे नजऱ आ रहे है. इन पक्तियों को पढऩे के बाद आपको लग रहा होगा कि हम कहां से कहां जा रहे हैं। इस किताब के कुछ और अंश देख लेते हैं
ग्र्रीस की रानी फ्रेडरिका जो कि एडवान्स्ड भौतिक शास्त्र से जुडी रिसर्च स्कालर थी का कहना है कि एडवान्स्ड भौतिकी से जुडऩे के बाद ही आध्यात्मिक खोज की तरफ मेरा रुझान हुआ. इसका परिणाम ये हुआ की श्री आदि शंकराचार्य के अद्वैतवाद या परमाद्वैत रुपी दर्शन को जीवन और विज्ञान की अभिव्यक्ति मान ली अपने जीवन में . प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेन हॉवर का यह कहना है कि सम्पूर्ण भू-मण्डल पर मूल उपनिषदों के समान इतना अधिक फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं नहीं हैं। इन्होंने मुझे जीवन में शान्ति प्रदान की है और मरते समय भी यह मुझे शान्ति प्रदान करें।
प्रसिद्ध जर्मन लेखक फ्रेडरिक श्लेगल (1772-1829) ने संस्कृत और भारतीय ज्ञान के बारे में श्रद्धा प्रकट करते हुए ये कहा है कि संस्कृत भाषा में निहित भाषाई परिपक्वता और दार्शनिक शुद्धता के कारण ये ग्रीक भाषा से कहीं बेहतर है। यही नहीं भारत समस्त ज्ञान की उदयस्थली है। नैतिक, राजनैतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भारत अन्य सभी से श्रेष्ठ है और इसके मुकाबले ग्रीक सभ्यता बहुत फीकी है.
इसके आगे के पन्नो में लेखक ने अपने लेखों में इन्ही सब महान पुरुषों के विचारों की अपने तरह से व्याख्या की है जिसमें आज के नैतिक पतन पर गहरा क्षोभ प्रकट किया गया. कुल मिलाकर हम लेखक के इस पवित्र प्रयास की सराहना करते हैं। आज की विषम परिस्थितयो में भी उन्होंने भारतीय संस्कृति के गौरव को पुनर्जीवित करने की कोशिश की है। उम्मीद है कि ये पुस्तक एक रौशनी की किरण बनेगी और हम सब एक सकारात्मक पथ पर अग्रसरित होंगे।
आदित्य शुक्ला, लेक्चरर, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार
प्रेषक- प्रियंका शर्मा
लोस एंजिल्स, केलिफोर्निया

अपने भारत को पहचानो

भारत उतना ही महान है जितना कि ईसा से ५०००वर्ष पूर्व था . आज के जन मानस की जीवन शैली मैं जरूर अंतर आ गया है. पहले आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य हुआ करता था .भौतिक उपलब्धि गौण लक्ष्य था तथा आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए साधन मात्र था. आध्यात्मिक उपलब्धि साध्य और भौतिक उपलब्धि हेय एवं साधन मात्र था. आज यह जीवन परिदृश्य बदल सा गया है .भौतिक उपलब्धि मुख्य लक्ष्य हो गया तथा आध्यात्मिक उपलब्धि भौतिक उपलब्धि के लिए साधन मात्र रह गया है . यह अत्यंत चिंतनीय विषय है. सच्चे भारतीय- संस्कृति -प्रेमी जन को इस हेतु स्व क्षमतानुसार उचित प्रयास करना ही चाहिए.
भारत के जन-वृन्द का दिवस ही चरित्र की प्रतिष्ठा से प्रारम्भ होता है. जागरण के समय ही परमपिता परमात्मा का स्मरण , माता-पिता को प्रणाम और नित्य कर्म के पश्चात यौगिक प्रक्रिया . यह एक अद्भुत दिनचर्या है. भारत में संध्या-वंदन का चलन रहा है. संध्या-वंदन के बाद ही अन्यान्य धार्मिक एवम सामाजिक अनुष्ठानों के सम्पादन कि स्वीकृति दी गयी है.संध्या-वंदन में पढ़े जाने वाले समस्त वैदिक मन्त्रों में एक ही ब्रह्म की वन्दना है. सूर्य देव को ब्रह्म स्वरूप मानते हुए मन ,वचन, कर्म से किये हुए समस्त पापाचरण से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है. यह अपने आप में अद्भुत है. पाप से मुक्ति हेतु प्रायश्चित का यह दैनिक अनुष्ठान विश्व में और कहीं नहीं किया जाता.
संध्या वंदन में सूर्य देव को जल से अर्घ्य देने का विधान है. एक बार मेरे गुरु-श्रेष्ठ लक्ष्मी नारायण शास्त्री संध्या-वंदन कर रहे थे. मैंने बाल स्वभाव से पूछा- संध्या-वंदन में अर्घ्य देते समय जलांजलि को ऊपर उठा कर क्यों विसर्जन किया जाता है ?
वे मुस्कराये और कहा-"यह समस्त ब्रह्माण्ड पंच-तत्त्वों से विनिर्मित है. किसी भी एक तत्त्व की कोई उपादेयता नहीं ,प्रत्येक तत्त्व एक दूसरे से मिल कर सृष्टी की रचना में सहायक हुआ. जलांजलि में प्रथम जल को लेकर ऊपर उठाया ,यह जल को आकाश तत्त्व से मिलाया गया, जल के विसर्जन में जब जल ऊपर से छोड़ा जाता है तब यह वायु के मिलन का अवसर है. जल वायु से मिलता हुआ पृथ्वी की ओर बढ़ता है.वह अपनी ही गति से तेज तत्त्व को प्राप्त कर लेता है .इस तरह चार तत्त्व जल, वायु, तेज, और आकाश मिला दिये गए .अब ये पृथ्वी से मिलते है. यह मिलन ही सृजन करता है. ब्रह्म इसी तरह शिव रूप में तत्त्वों का विखंडन एवम विष्णु रूप में संयोजन करते हैं . हमें जीवन में सभी की उपादेयता संयोजन में ही देखनी चाहिए .सभी जड़ -चेतन पदार्थों में इन्हीं पंच तत्त्वों को देखना चाहिए और उनमें उस जीवन दाता ब्रह्म की अनुभूति करनी चाहिए . यही हमारी संस्कृति का मूल उत्स है". दिवस की ऐसी निर्मल एवं कोमल आरम्भ की प्रक्रिया भारत के सिवाय कहीं देखने को नहीं मिलती है.
भारतीय संस्कृति "भय से मुक्ति " की एक सशक्त प्रक्रिया है. भय तब तक बना रहेगा जब तक द्वैत्व स्थापित है. भय से मुक्ति के लिए ही भारतीय संस्कृति अपने अंतर में प्रतिष्ठित पुरुष को बाह्य अशरीरी पुरुष के साथ एक रूप होने का सन्देश देती है. जो कुछ जगत में विद्यमान है और जैसा आप अनुभव कर रहें हैं बस वैसा ही आपके अंतर में विद्यमान है. इस तरह द्वैत्व के स्थान पर अद्वैतव को स्थापित कर भय से मुक्ति का रास्ता दिखा दिया गया. यह ज्ञान से ही संभव है. ज्ञान सत्य और ब्रह्म नित्य है.
बिना ज्ञान के भय से मुक्ति नहीं .अज्ञान मोह का कारक है. मोह पाप का तथा पाप भय का कारक है. अतः मुक्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है .आत्म ज्ञान ही आनंद का श्रोत्र एवम अभयत्व का हेतु है. यह भारत की सांस्कृतिक पराकाष्ठा की पहचान है. जिसे आज पश्चिम शारीरिक-भाषा के रूप में ले रहा है.जिसे सीखने -सिखाने के लिए होड़ मची है.पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है. भारतीय इस में पीछे नहीं है .वे अपने ही उत्पाद को अन्य का मान खरीदने के लिए दीवाने दिखाई दे रहें हैं .
चीन , यूरोप, अमेरिका जिस योग और अंतर-यात्रा की बात कर रहें हैं वह भारत की उन पर उधारी है. अंतर-यात्रा भारतीय साधना है. यहाँ अंतर की यात्रा चरित्र-शोधन एवम जबरदस्त चरित्र-प्रतिष्ठा की जीवन यात्रा है. बिना चरित्र के भला आत्मानंद स्वरूप ब्रह्म कहाँ मिलने वाला है ? श्रीमद भगवत गीता में अर्जुन प्रभु श्री कृष्ण से पूछते है- प्रभु श्री! आपको कौन सा व्यक्ति प्रिय है ? श्री कृष्ण कहतें हैं- अर्जुन ! जो व्यक्ति द्वेष से रहित रहते हुए सभी प्राणियों के साथ मित्रता और करुणा के साथ रहता हो ,अनासक्त एवम अहंकार रहित रहता हो, दुःख एवम सुख में सामान रहता हो ,जो स्वयं में सम्पूर्ण लोक को एवम सपूर्ण लोक में स्वयं को देखता हो ,जो हर्ष , क्रोध ,भय जैसे अनुदात भावों से मुक्त है वह ही मुझे प्रिय है. श्री कृष्ण ने उदात्त और उदार चरित्र को बता दिया .जिसका चरित्र उदात्त और उदार है, वही आत्मज्ञान का अधिकारी है,वही अन्तर यात्रा का अधिकारी हो कर विराट ब्रह्म की सायुज्यता प्राप्त कर सकता है. मुझे दुःख है कि आज विश्व भारतीय चेतना को पकड़ रहा है और भारतीय अपने आत्म कल्याण को भूल कर साधन को ही साध्य मान रहें हैं.
जीवन का उद्देश्य आनंद है. क्योंकि ब्रह्म के सच्चिदानंद स्वरुप से सत-चित तत्त्वों से सृष्टि का रचन हुआ .सृष्टि में नहीं है, तो आनंद तत्त्व नहीं .इसीलिए यह सृष्टि निरानंद कही और मानी गयी . जो नहीं है उसे तो प्राप्त करना है.आनंद नहीं है. उसे प्राप्त कर के ही जीवन सार्थक कर सकतें हैं .आनंद प्राप्त किया तो मान लो कि ब्रह्म मिल गया . उसे प्राप्त करने के ऋषियों ने छह मार्ग -अन्न ,प्राण ,चक्षु ,श्रोत ,मन और वाणी बताये. तपश्चर्या से इन मार्गों का निर्वाह करने का आदेश दिया . इसी से विज्ञान और आनंद प्रशस्त होता है. और तभी विराट ब्रह्म में लय होता है. यह सब अभी बहुत आगे की बात है. पश्चिम ने तो अभी सतही तोर पर इस विराट विषय का स्पर्श मात्र अनुकरण किया है. अभी उसे बहुत कुछ समझना शेष है.
सलिल जवाली की पुस्तक - "भारत क्या है?" उन लोगों की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त दस्तावेज है जो कि भारतीय संस्कृति को भूलने जा रहें हैं या किसी भ्रम के शिकार हो कर पश्चिम की अंधी दौड़ में भाग ले रहें हैं . पश्चिम चुपके-चुपके ही सही भारत के पारलौकिक ज्ञान के प्रति विनत होता चला जा रहा है.
इसके लिए सलिल जवाली का प्रयास अभिवंदनीय है.
-त्रिलोकी मोहन, राजस्थान

प्रेषक- प्रियंका शर्मा
लोस एंजिल्स, केलिफोर्निया

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

मकर संक्राती एवं सात का महत्व


यह बडी दिलचस्पी का विषय है कि इस सदीके सातवें साल याने सन 2007
के सातवें महीनें यानि जुलार्इ्र की सात तारीख को सांयकाल 7 बजे पुर्तगाल के लिस्बन
षहर में विष्व के सात नये आष्चर्य तय किए गए और उनका चुनाव भी दुनियां भर में
स्थित निम्नलिखित इक्कीस स्थानों में से किया गया जो-क्रमषः एक्रोपोलिस यूनान,
कोलोसियम इटली, कियोमिजु मंदिर जापान, गीजा पिरामिड मिश्र, अलहंब्रा स्पैन, ईस्टर
प्रतिमा चिली, क्रेमलिन रूस, लिबर्टी स्टैच्यू अमेरिका, अंगकोर कम्बोडिया, ऐफेलटॉवर फ्रांस,
माचू पिच्चू पेरू, स्टोनहेंज ब्रिटेन, इत्जा पिरामिड मैक्सिको, चीनकीदीवार चीन, नियुष्वांस्टीन
जर्मनी, ऑपेरा हाउस आस्ट्ेलिया, क्राइस्ट रिडिमर ब्राजील, तुर्की पेत्रा जॉर्डन, टिम्बकटू माली
तथा ताजमहल भारत हैं. जिसमें अंततोगत्वा आगरा स्थित प्रेम के समर्पण की सबसे उॅची
मिषाल ताजमहल को षामिल किया गया. वैसे पूर्व में संसार के निम्नलिखित सात अजूबें
माने जाते थे जिसमे से मिश्र स्थित गीजा के पिरामिड को छोडकर अब किसी का वजूद
नही है. ये आष्चर्य है:-गीजा के पिरामिड, बेबीलोन के झूलते बाग, ओलंपिया ग्रीस में
जियूस देवता की मूर्ती, टर्की के इफेसिस में देवी डायना का मंदिर, ऐषिया माईनर में
हैलीकार्नासिस के षासक मोसालस का मकबरा, रोडस द्वीप में सूर्य देवता हीलियोस की
कांसे की विषालकाय प्रतिमा और सिकन्दरियां बन्दरगाह के पास एक द्वीप पर फारोस का
प्रकाष स्तम्भपूरे
विष्व में ही और खासकर अपने देष भारत में सात का बडा महत्व है,
प्रति वर्ष 14, यानि 7गुणा2, जनवरी को ही पड़ने वाली मकर संक्राति का सात के अंक के
साथ रिष्ता है, इस दिन सप्त रष्मियांे का मालिक सूर्य अपने सात घोड़ांे के रथ पर सवार
होकर मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ना षुरू करता है, सूर्य दक्षिणायण से
उत्तरायण की तरफ अपनी यात्रा षुरू करता हैं, सूर्य की किरणें सात रंगो से बनी होती हैं
(बैंगनी, गहरानीला, नीला, हरा, पीला, नारंगी एवं लाल) जो कभी-कभी वर्षा ऋतु के दौरान
इन्द्रधनुष के रूप मंे दिखाई पड़ती हैंसूयर्
आसमान मंे दिखता है, आसमान मंे ही सप्त ऋृषि मण्डल (कष्यप, भारद्वाज,
अश्रि, विष्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वषिष्ठ) हैं जो कभी भी तारांे भरी रात मंे देखा जा
सकता है, सात लोक (भू, भूवः, स्वः, महः, जन, तप और सत्य) एवं सात पाताल (अतल,
वितल,सुतल, तलातल, महातल, रसातल एवं पाताल) की यह दुनियां जिसमंे हमारी मां पृथ्वी
भी एक हिस्सा है, जिसमंे सात महाद्वीप (एषिया, यूरोप, अफ्रिका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी
अमेरिका, आस्ट्रेलिया एवं ग्रीनलैण्ड) एवं सात समुद्र (प्रषान्त महासागर, हिन्द महासागर,
अरब सागर, आर्कटिकसागर, भूमध्यसागर, अटलांटिक महासागर एवं कैस्पियन सागर) की
यह दुनिया निराली है तभी तो बच्चे खेल ही खेल मंे कहते हैं सात समुन्दर, गोपी चन्दर,
बोल मेरी मछली कितना पानी ?
चाहे इंगिलष सिस्टम में सप्ताह के दिन, मन्डे, टयूसडे, वैडनैसडे, थर्सडे, फ्राई
डे, सटरडे एवॅ सन्डे हो चाहे हिन्दी के, सोमवार, मॅगलवार, बुधवार, वृहस्पतिवार, षुक्रवार,
षनिवार एवॅ रविवार हो अथवा फ्रंेच (लुन्दी, मारदी, मरक्रेदी, ज्वेदी, वान्द्रेदी, सामदी एवं
दिमाष) सभी मंे काल खण्ड को सात ग्रहांे (चन्द्र, मंगल, बुद्व, गुरू, षुक्र, षनि, एवं सूर्य)
के आधार पर सात दिवसांे मंे विभाजित किया गया हैं. सनातन धर्म में रष्मियों के स्वामी
सूर्य देवता के अलावा सात देवियांे (वैष्णांे देवी, चिंतापूर्णि, ज्वालाजी, कांगडाजी, चामुंडाजी,
नैनादेवी, एवं मनसादेवी) की पूजा माई साते (माघ महीने कीे सप्तमी) को की जाती है दुर्गा
माता के विचित्र रूप एवं नाम जगह-जगह भिन्न है, लेकिन स्वरूप एक ही है। चैत्र माह में
सील सप्तमी के रोज समस्त उत्तरी भारत में ठन्डा खाना खाया जाता है, हिन्दुओं के पवित्र
धार्मिक स्थलांे मंे चार धामों के साथ-साथ सात पुरियांे (हरिद्वार, काषी, उज्जैन, कांची,
द्वारका, मथुरा, अयोध्या) का भी महत्व है, धार्मिक ग्रन्थों मंे सात द्वीप (जम्बू, प्लक्ष, कुष,
क्रौंच, षक, षाल्मली एवं पुष्कर) सात समुन्दर (लवण, इक्षु, दधि, क्षीर, मघु, मदिरा एवं
घृत) एवं सात ही महाऋृषियांे ( मरीचि, अंगीरा, अग्नि, पुलह, केतु, पौलस्त्य, एवं वषिष्ठ)
का वर्णन हैंमनुष्य
का षरीर सात धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेदा (चर्बी) अस्थि, मज्जा,
षुक्र) से बना है और पुर्षाथर््ा के साथ साथ तकदीर भी साथ दे तांे मनुष्य सातों सुख
(निरोगी काया, संतोषजनक आय, मधुरभाषी पत्नि, सुयोग्य पुत्र, विद्या, उत्तम आवास एवं
अच्छा संग) भोग सकता हैं. स्वस्थ्य षरीर के लिए मनुष्य को सात क्रियाओं (षौच,
दंतधवन, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन एवं षयन) की आवष्यकता है इसमंे भी दंातों की
रक्षा हेतु सात वृक्षों (नीम, बबूल, आम, बेल, गूलर, करंज एवं कैर) की टहनियां बहुत
उपयोगी हैं तथा दांतधवन के पष्चात षुद्वि हेतु प्रातःकाल सात प्रकार के स्नान (मन्त्रस्नान,
भौमस्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्यस्नान, करूण स्नान एवं मानसिक स्नान) में से
कोई एक स्नान आवष्यक हैं. (प्रातःकाल स्नान के पष्चात मंगल दर्षन हेतु सात पदार्थो
(गोरोचन, चंदन, र्स्वण, शंख, मृदंग, दपर्ण एवं मणि) की आवष्यकता पड़ती हैं. हमारा एक
स्थूल षरीर है जिसमे सात चक्र अर्थात षक्ति केन्द्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर नाभि,
अनाहत यानि हृदय, विषुद्धि, आज्ञा तथा सहस्त्रार होते हेैमनुष्य
के लिए सात प्रकार की आंतरिक अषुद्वियां (ईर्षा, द्वेष, क्रोध, लोभ,
मोह, घृणा, एवं कुविचार) और सात प्रकार की बाह्य षुद्वियॉ (पूजा-पाठ, मन्त्र-जप,
दान-पुन्य, तीर्थयात्रा, ध्यानयोग एवं विद्यादान) होती है, उसको सदा सात (माता, पिता, गुरू,
ईष्वर, सूर्य, अग्नि एवं अतिथि) का अभिवादन करना चाहिए, सदाचार से मनुष्य को सात
विषिष्ट लाभ (जीवन मंे सुख, षांति, भय का नाष, विघ्न से रक्षा, ज्ञान, बल एवं विवेक)
प्राप्त होते हैं।
मुहावरा है कि गृहस्थी मंे सातांे ही चीजांे की आवष्यकता होती है इसलिए
गृहस्थाश्रम (विवाह) मंे प्रवेष के पहले सात फेरे खातंे है कहते हैं कि सात पद साथ 2
चलने से अनजान भी मित्र बन जाता है। फेरे मंे वर के साथ वधु भी सात कदम चलती है
उसे सप्तपदी कहते है, वह वर से सात वचन मांगती है
1. यज्ञ मंे सहयोग।
2. दान में सहमति।
3. धन की सुरक्षा करना।
4. आजीवन भरण-पोषण।
5. सम्पति खरीदने मंे सहमति।
6. समयानुकूल व्यवस्था।
7. सखी-सहेलियांे मंे अपमानित नहीं करना।
और निम्नलिखित सात ही वचन देती है।
1. भोजन व्यवस्था।
2. षीलसंचय, आहार तथा संयम।
3. धन का प्रबन्ध।
4. आत्मिक सुख।
5. पषुधन सम्पदा।
6. सभी ऋृतुआंे मंे उचित रहन-सहन।
7. सदैव पति का साथ।
दैनिक जीवन मे हम यह देखते है कि संगीत मंे स्वर सात प्रकार के होते हैं।
1. सा (षडज)
2. रे (ऋृषभ)
3. गा (गांधार)
4. मा (मध्यम)
5. प (पंचम)
6. धा (धैवत)
7. नि (निषद)
और कवि विहारी ने हिन्दी साहित्य मंे जो दोहंे लिखे हैं वह सतसैंया के दोहंे के
नाम से मषहूर है।
‘‘ सत सैयां के दोहरे, जो नाविक के तीर,
देखन मंे छोटे लगे, घाव करे गम्भीर.’
पूर्वी उत्तर प्रदेष तथा बिहार के आम आदमीं का खाना जौ का
सत्तू है और बच्चे बचपन मंे सात की ताली तथा सतौलियॉ का खेल खेलते हैं और बड़े
बूढ़ों की यह कहावत याद रखते हैं कि सात मामों का भानजा भूखा रहता है जब कि बहुत
मेहनत करने पर भी कुछ खास नहीं करने वाले के लिए कहा जाता है कि ‘‘सात धोबों का
एक पाव किया है’’ और भाषाओं की तरह पंजाबी मंे भी एक कहावत है।
माई पूत जण्यां सत्त, पर करम न दिया बटट.’
अर्थात एक मां के सात लड़के हुए लेकिन उनके भाग्य अलग-अलग हैं।
तुलसीदासजी ने सात खंडांे (बाल्यकांड, अयोध्याकांड, अरन्यकांड,
किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड, लंकाकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड) में रामचरित मानस की रचना करके
एक अनुपम ग्रंथ उपलब्ध कराया है जिसमंे जीवन की समस्याओं का समाधान है, राधास्वामी
सम्प्रदाय में नाम की महिमा बताते हुए आत्मा के सात खंडों की यात्रा कराते हैे. इस तरह
हम देखते है कि पूरे विष्व में और भारत में सात की बडी महिमा हैं
ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 98737063339

बुधवार, 11 जनवरी 2012

पहलें दालों, फिर मसालों, अब सालों की बारी है !


यूपीए के षासनकाल में कभी दालों का नम्बर आया था. इनकी षासन
व्यवस्था की कृपासे एक समय दालों के भाव आसमान छूने लगे थे. जहां पहलें
आम लोग कहा करते थे ‘दाल रोटी रोटेटी खाओ,े, प्रभ््रभु के गुण्ुा गाओ’ वही मुहावरा
बदलकर कहने लगे ‘दाल मत खाओ,े, प्रभ््रभु के गुण गाओ’. अब साधारण आदमी
आपसी बातचीत में भूलसे भी यह नही कहता कि ‘दाल रोटेटी खाकर गुजुजारा कर
रहे है’ क्योंकि बीच में ऐसा वक्त भी आगया था कि ‘दाल’ षब्द का नाम लेते
ही इन्कमटैक्स के मुखबिर पीछे लग जाते थे. कहनेवालें तो यहां तक बताते है
कि इसी विभाग के लोग दाल खानेवालें परिवारों का सर्वें करने लग गए थे कि
कौन कौन ‘अमीर’ं दाल खा रहा है ? यह लोग रिर्टन भर रहे है या नही ?
उत्तर भारत में लोग दाल-रोटी, पूर्वभारतमें दाल-भात-माछी और दक्षिण में
भात-सांभर का नाम लेने से परहेज करने लगे थे. चारों तरफ दाल को लेकर
दहषत फैल गई थीफिर
किराना मार्केट में मसालों का नम्बर आया. अखबारवालें तरह तरह
की व्यापारिक खबरें देने लगे. ‘जीरे में उछाला’, ‘तेजपात आसमान की ओर’,
‘हल्दी आंख दिखाने लगी’, ‘धनिया गुर्राया’ इत्यादि. अब आपही बतायें कि इनमें
से किस मसालें की यह ताकत है कि अपने आप कुछ करले ? यह सब सरकारी
छत्रछाया में बडें बडें और अगाउ सौदा करनेवाले व्यापारियों का काम हैे और
मुक्त व्यापार व्यवस्था और विष्वबैंक के ईषारों पर चलने का परिणाम हैंऔर
अब चुनाव आतेही ‘सालों’-कृप्या माफ करें-की बन आई हैं. वैसे
सालों की दखलंदाजी द्वापरयुग यानि महाभारतकाल में मामा षकुनि के समयसे
चली आरही हेैं लेकिन वर्तमान समय में यह तब ज्यादा चमकी जब ‘जीजी’ के
राज में सांयकाल होते ही पटना की सडकें सूनी होजाती थी. सरे आम महिलाओं
की अस्मिता पर हाथ उठने लगे. इसका परिणाम यह निकला कि बिहार ही नही
समस्त उत्तरी भारत में माताएं अपने रोते हुए बच्चों को चुप कराने हेतु कहने
लगी ‘चुप होजा वर्ना साधु पकड लेगा’. वह यह नही बताती थी कि कौनसा
साधु ?
उसी ‘सालों के दौर’ में एक जीजा की एक कवि के षब्दों में चंद लाइनें
देखिए:-
‘मेरी उनके कुछ अजब षौक कि,
घर में एक नया रोग पालें है,
इनसे मिलिए, यह मेरी बीबी के सगे भाई,
यानि कि मेरें सालें हैइनकी
सात सगी बहनें है,
इनके लाड प्यार के क्या कहने हेै ?
यह अपने घर नही, कभी किसी, कभी किसी
के यहां रह आते है,
सालभर लखनउ में नही रहते,
फिर भी कहते है कि,
हम लखनउ के रहनेवालें है. यह मेरें सालें है....’
यह सालों का रूतबा इतना बढा कि पिछलें चुनावों में एक नेताजी जब
चुनाव जीतकर आएं तो सरासर ऐलान कर दिया जो एक कवि के षब्दों में इस
प्रकार हेै:-
‘पांच सालों के जीजाजी,
म्ंात्री बनते ही बोले,
मैं अपने फर्ज पर खरा उतरूंगा,
पांच सालों के लिए आया हूं,
पांच सालों के लिए, काम करूंगा.’
इस तथाकथित लोकतंत्र में इस ऐलानसे किसी को क्या एतराज हो सकता
था ? खैर, अब सालों एवं भाई-भतीजों के दौर में देष के पांच राज्यों की
विधानसभा चुनावों के समय कतिपय राजनैतिक दलों द्वारा अपने भाई-भतीजों
एवं सालों को टिकट दिए गए हैं. इनमें कई तो चारोंधाम-कांग्रेस, बीजेपी,
़समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी-की यात्रा किए हुए है और अब सात
पुरियों-नोट,षराब, जाति,मजहब,प्रांत, भाषा ओैर कुनबें-में से किसीनकिसी में
डुबकी लगाकर चुनावी वैतरणी पार करने की सोच रहे हैं. इस चुनावी दंगल में
यह देखना भी दिलचस्प है जिसमें बाबूसिंह कुषवाहा प्रकरण में बीजेपी ने ‘पाप
से घृणा करो,े, पापी से नही’ के सिद्धांत के आधार पर यह दलील दी है कि
‘भ्रष्टाचार से परहेज करो, भ्रष्टाचारी से नही’. देखा आपने ? भ्रष्टाचार के
विरूद्ध रथयात्रा निकालनेवालों का तर्क ? इसलिए यही कहना पडेगा कि पहलें
दालों, फिर मसालों और अब सालों की बारी है !
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 98737063339

सोमवार, 9 जनवरी 2012

इसे मेरी चाहत कहूँ


इसे मेरी चाहत कहूँ
किसी रिश्ते का नाम दूं
या फिर मेरी फितरत कहूं
कुछ तो हैं जो मुझे
दूर नहीं होने देता उनसे
रह रह कर याद आते
जब भी मिलते हँस कर
मिलते
दिल को गुदगुदाते
कुछ वक़्त के लिए गुम
हो जाते
खिले फूल को मुरझाते
उनका अंदाज़ निरंतर
हैरान करता
ना जाने ऐसा क्यूं करते ?
दूर रहकर भी पास लगते
दिल के किसी कौने में
छुपे रहते
इसे मेरी चाहत कहूँ
किसी रिश्ते का नाम दूँ
या फिर मेरी फितरत कहूँ


साली बोली हँसमुखजी से(हास्य कविता)


साली बोली हँसमुखजी से
नाम आपका हँसमुख
फिर भी रोते से क्यों लगते?
हँसमुखजी तुनक कर बोले
छोटे मुंह बड़ी बात
नाम बेचारा क्या करेगा
जिसकी
बीबी तुम्हारी बहन हो
वो हंसता हुआ भी
रोता सा लगेगा
साली को लगा झटका
नहले पर मारा दहला
लपक कर बोली
हूर के बगल में लंगूर
हमेशा लंगूर ही रहता
शक्ल-ओ-सूरत का दोष
फिर भी हूर को देता
दहले पर पडा
हँसमुखजी का गुलाम
तपाक से बोले
गलती मेरी ही थी
तुम्हारी बहन के मुख से
बाहर झांकते दांतों को
मुस्काराहट समझ बैठा
शूर्पनखा को हूर समझ
ज़ल्दबाजी में हाँ कह बैठा
उसको तो सहना ही पड़ता
हूबहू अक्ल शक्ल की
साली को भी अब
निरंतर झेलना पड़ता

नहीं कह सकते वह बात

नहीं कर सकते
वह काम जो तुमको
पसंद है
नहीं कह सकते वह बात
जो सरासर झूठ है
दिन को दिन
रात को रात कहना
हमारी फितरत है
करेंगे नाराज़ बहुतों को
खायेंगे गालियाँ
पर बदलेंगे नहीं हम
नहीं बेच सकते ईमान
तुम्हें खुश करने के लिए
सिरफिरा भी कहोगे
तो खुशी से सुन लेंगे हम
बेईमान
होने से तो अच्छा है
अकेले सर
ऊंचा कर के जीना
खाते रहेंगे ज़ख्म
लोगों के
मगर बनेंगे नहीं
बहरूपिया
इस जन्म में हम


अभी तक आये नहीं,तो कोई बात नहीं

अभी तक आये नहीं
तो कोई बात नहीं
क्या बीतती है दिल पर
कैसे बताएं तुम्हें
फिर हम भी घबराए नहीं
आस दिल की अब तक
पूरी हुई नहीं
अकेले जीने की मजबूरी
अभी ख़त्म हुई नहीं
बेताब दिल
बेचैन आँखों को
राहत मिलेगी
जुदाई कभी तो
मिलन में बदलेगी
उम्मीद
अभी टूटी नहीं
अभी तक आये नहीं
तो कोई बात नहीं


दुनिया बदल गयी,फितरत बदल गयी

दुनिया बदल गयी
फितरत बदल गयी
रिश्तों में कडवाहट
भाई बहन में दूरियां
बढ़ गयी
हवा प्रदूषित हो गयी
चौपाल अब फेस बुक,
ट्विटर पर लगने लगी
अब पेन,
स्याही की चिंता
सताती नहीं
दीपावली मिलन
एस एम एस से होने लगा
मन की
बात कहने के लिए
ब्लॉग मिल गया
चिट्ठी पत्री के लिए
अब इ मेल हो गया
घर का शयन कक्ष
सिनेमा हॉल बन गया
दिन रात टी वी देखना
ज़रूरी हो गया
खेल के मैदानों में
कॉलोनियां बस गयी
खेलने के लिए
कंप्यूटर मिल गए
लडकी की बरात
लड़के के शहर जाने लगी
शादियाँ दो दिन में
निमटने लगी
दुनिया अब इंटरनेट की
मुट्ठी में समा गयी
हज़ार मील दूर से भी
शक्ल चुटकियों में
दिखने लगी
मोबाइल अब मूंछ का
बाल हो गया
छोटे से बड़े तक
हर शख्श के लिए ज़रूरी
हो गया
गाँव शहर में दूरी कम
हो गयी
पैसे कमाने की होड़
बढ़ गयी
लडकियां लडको से
आगे बढ़ रही
संतुष्टी कोसों दूर
चली गयी
दुनिया अब दिखावे की
रह गयी
इमानदारी आंसू बहा
रही
बेईमानों की चांदी
हो रही
राजनीति सत्ता तक
सीमित हो गयी
कर्तव्य,निष्ठा की बातें
पुरानी हो गयी
हमारी तुम्हारी
फितरत बदल गयी

आवाज़ देता हूँ

निरंतर
आवाज़ देता हूँ
दिल से बुलाता हूँ
तुम आती नहीं हो
या तो पहुँचती नहीं
मेरी आवाज़ तुम तक
या मजबूर हो
ज़माने से डरती हो
घबराती हो
कहीं टूट ना जाए
दिल का रिश्ता हमारा
खामोशी से सहती हो
दिन रात तड़पती हो
खुद आकर ले जाऊं
इस इंतज़ार में
बैठी हो

मोहब्बत के पिंजड़े में

मोहब्बत के
पिंजड़े में दिल
चुपचाप ग़मों को
सहता रहता
मजबूरी की
सलाखों के पीछे
दुखी होता रहता
इंतज़ार में
तड़पता रहता
उड़ने को बेचैन
मगर बेबसी में
परेशां होता रहता
कब पैगाम आयेगा?
दीदार उसका होगा
निरंतर ख्यालों में
डूबा रहता
उम्मीद में ना सो
पाता
ना जाग पाता


नए साल का शोर मच रहा है

शुभ कामनाओं का
दौर चल रहा है
नए साल का शोर
मच रहा है
हर व्यक्ति खुश हो रहा है
आस लगाए बैठा हैं
चमत्कार हो जाएगा
सब कुछ बदल जाएगा
इस प्रयास में लगा है
सब बदल जाएँ
पर खुद को
नहीं बदलना पड़े
मैं हैरान हूँ
समझ नहीं आ रहा
सब कैसे बदल जाएगा ?
कैसे समझाऊँ उन्हें ?
फितरत और सोच
बदले बिना
स्वार्थ को छोड़े बिना
कुछ नहीं बदला कभी
अब कैसे बदल जाएगा ?
नए साल में खुद को
बदलो
समय के साथ
सब बदल जाएगा



सोच

स्वछन्द आकाश में
विचरण करने वाली
पिंजरे में बंद कोयल
अब इच्छा से कूंकती
भी नहीं
कूँकना भूल ना जाए
इसलिए कभी कभास
बेमन से कूंक लेती
ना साथियों के साथ
खेल सकती
ना ही अंडे से सकती
खाने को जो दिया जाता
बेमन से खा लेती
उड़ने को आतुर
पिंजरे की दीवारों से
टकरा कर
लहुलुहान होती रहती
लाचारी में जीवन काटती
एक दिन सोचने लगी
इंसान इतना
निष्ठुर क्यों होता है?
खुद के
बच्चों के लिए जान देता
अपने शौक के लिए
निर्दोष पक्षियों को बंदी
बना कर रखता
इश्वर को मानने वाला
पक्षियों को क्यों मारता?
विधि का विधान कितना
निराला है
ताकतवर अपनी ताकत का
उपयोग
अपने से कमज़ोर पर ही
क्यों करता ?
पक्षियों के आँखों से
आंसूं भी तो नहीं आते
कैसे अपना
दर्द कहें किसी को?
अंतिम क्षण तक
घुट घुट कर जीने के सिवाय
कोई चारा भी तो नहीं
शायद परमात्मा उसकी
बात सुन ले
किसी तरह इंसान को
समझ आ जाए
कमज़ोर पर
अत्याचार करना छोड़ दे
उसे फिर से स्वतंत्र कर दे
आकाश में उड़ने दे
तभी मन में विचार आता ,
अब उड़ने की
आदत भी तो नहीं रही
कहीं ऐसा ना हो?
उड़ने के प्रयास में
कोई और
उसका शिकार कर ले
मैं यहीं ठीक हूँ
कम से कम जीवित तो हूँ ,
खाने के लिए भटकना तो
नहीं पड़ता
इश्वर की यही इच्छा है
तो फिर दुखी क्यों रहूँ
सोचते सोचते खुशी में
कोयल कूंकने लगी
तभी मालिक की
आवाज़ आयी
सुनते ही सहम कर
चुपचाप पिंजड़े के कौने में
सिमट कर बैठ गयी
फिर से अपने को बेबस
लाचार समझने लगी
सकारात्मक सोच से फिर
नकारात्मक सोच में
डूब गयी

लोग क्या कहेंगे ?

बड़े मन से मैंने
कोट का कपड़ा पसंद किया
फिर शहर के प्रसिद्द दरजी से
उसे सिलवाया
पहन कर यार दोस्तों के बीच
पहुँच गया
आशी थी सब कोट की
प्रशंसा करेंगे
मेरी पसंद की दाद देंगे
किसी ने प्रशंसा में
एक शब्द भी नहीं कहा
उलटा एक मित्र ने,
कोट को पुराने तरीके का
बता दिया
मन मसोस कर रह गया
आशाओं पर तुषारा पात
हो गया
घर लौटते ही उसे उठा कर
अलमारी में टांग दिया
तय कर लिया
अब उसे कभी नहीं पहनूंगा
जो पैसे खर्च हुए,उन्हें भूल
जाऊंगा
साल भर कोट अलमारी में
टंगा रहा
सर्दी आने पर अलमारी खोली
तो कोट नज़र आया
समारोह में जाना था
मन ने कहा तो
आज फिर उसे पहन लिया
समारोह स्थल पर पहुँचते ही
लोगों से मिलने जुलने लगा
कोट को भूल गया
मुझे यकीन नहीं हुआ
जब किसी ने कहा
आपने बहुत सुन्दर कोट
पहना है
फिर एक के बाद एक
कई लोगों ने कोट की प्रशंसा करी
मैंने भी तय कर लिया
हर समारोह में
इसी कोट को पहनूंगा
घर लौटते समय सोचने लगा
एक व्यक्ति ने कोट की
हँसी उडाई
तो मैंने उसकी बात को
ह्रदय में उतार लिया
कोट को भी मन से उतार दिया
आज इतने लोगों ने कोट की
प्रशंसा करी
तो गर्व से सीना फूल गया
क्यों थोड़ी सी प्रशंसा
सर पर चढ़ती ?
छोटा सा कटाक्ष बुरा लगता
क्यों हम लोगों के कहने को
इतना महत्व देते ?
अपनी पसंद को भी
किसी के कहने से छोड़ देते
ऐसे जीवन का क्या अर्थ?
जिसमें मनुष्य मन की इच्छा से
कुछ नहीं कर सकता
सदा लोग क्या कहेंगे की
चिंता में डूबा रहता
अनमने
भाव से जीता जाता


अपने ज़ज्बातों को कैसे छुपाऊँ?

अपने
ज़ज्बातों को कैसे
छुपाऊँ?
दिल की आग को कैसे
बुझाऊँ
चाहत को सीने में
दबा कर कैसे रखूँ?
ख्यालों के समंदर को
उफनने से कैसे रोकूँ?
ख्वाबों में उनसे कैसे
ना मिलूँ?
हसरतों को मचलने
कैसे ना दूं?
क्यूं ना उनसे ही
पूछ लूं?
ज़रिये नज़्म
हाल-ऐ-दिल बता दूं
या तो वो समझ जायेंगे
ज़रिये पैगाम
अपनी रज़ा बता देंगे
नहीं तो मोहब्बत पर
एक और नज़्म
समझ कर पढ़ लेंगे
मेरे अरमानों को
ठंडा कर देंगे

समाधान

शमशान में
वर्षों से खडा बरगद का
विशालकाय पेड़
आज कुछ व्यथित था
मन में उठ रहे प्रश्नों से
त्रस्त था
विचार पीछा ही नहीं
छोड़ रहे थे
एक के बाद एक
क्रमबद्ध
तरीके से चले आ रहे थे
क्यों उसका
जन्म शमशान में हुआ?
यहाँ आने वाला
हर व्यक्ति केवल जीवन ,
म्रत्यु और वैराग्य की
बात ही करता
उसकी छाया के नीचे
कोई सोना नहीं चाहता
ना ही आवश्यकता से अधिक
रुकना चाहता
शीघ्रता से घर लौटना
चाहता
बच्चे उसके आस पास
नहीं खेलते
ना ही कोई खुशी से
उसके पास आता
ना ही खुल कर हंसता
उसे निरंतर मनुष्यों का
क्रंदन ही सुनना पड़ता
रात में मरघट की शांती
उसे झंझोड़ती रहती
नहीं चाहते हुए भी
राख के ढेर में कुत्तों को
मानव अवशेष ढूंढते
देखना पड़ता
बरगद तय नहीं कर
पा रहा था
क्यों उसे जीने के लिए
शमशान ही मिला ?
क्या वो भी मनुष्यों जैसे
पिछले जन्म के
अपराधों की सज़ा काट
रहा?
या फिर उसके भाग्य में ही
ऐसा एकाकी,नीरस जीवन
जीना लिखा है ?
क्या निरंतर उदास
चेहरों कोदेखना ?
उनकी दुःख भरी बातों को
सुनना
हर दिन रोने बिलखने की
आवाज़ सुनना
उसके जीवन का सत्य है
तभी उसे नीचे बैठे
वृद्ध साधू की आवाज़
सुनायी दी
वो कह रहा था
परमात्मा ने जो भी दिया
जैसा भी दिया
जितना भी दिया
उसे शिरोधार्य करना चाहिए
निरंतर संतुष्ट रहने का
प्रयास करना चाहिए
जब तक जीना है
खुशी से परमात्मा की
इच्छा समझ कर
जीना चाहिए
व्यर्थ ही दुखी होने से
जीवन सुखद नहीं होता
उलटे अवसाद को
निमंत्रण मिलता
जीवन कंटकाकीर्ण
हो जाता
बरगद को लगा
उसे उसके प्रश्न का
उत्तर मिल गया
उसकी व्यथा का
समाधान हो गया

अब क्यों पहचानेगा कोई मुझको?

अब क्यों पहचानेगा
कोई मुझको
सहारा ले कर पहुँच गए
इतनी ऊंचाई पर
दिखता नहीं कोई उन्हें
वहां से
मैं जहां था वहीँ खडा हूँ
हाथ अब भी वैसे ही
बढा रहा हूँ
जिसे लेना है जी भर कर
ले ले सहारा मेरा
निरंतर
सफलता की सीढियां
चढ़ता जा
आकाश कीऊचाइयों को
छूता जा
याद करे तो फितरत
उसकी
नहीं करे तो इच्छा
उसकी
बस इतना सा याद
रख ले
उतरेगा जब भी नीचे
कोई ना पहचानेगा उसे
रोयेगा तो भी
कंधे पर हाथ नहीं
रखेगा
कोई उसके


उसूलों पर चलता हूँ


इमानदारी से जीता हूँ
झूठ नहीं बोलता हूँ
उसूलों पर चलता हूँ
कुछ मुझे धरती से
जुडा हुआ कहते
एक अच्छा
इंसान समझते
कुछ मेरी
इमानदारी पर
शक करते
मेरे उसूलों को
ढकोसला कहते
मुझे परवाह नहीं
कौन क्या कहता ?
मुझे तो जीवन यात्रा में
निरंतर परमात्मा के
उसूलों पर चलना है
इंसान बन कर जीना है
अच्छा लगे या बुरा
किसी के कहने से
अपना सोच नहीं
बदलना है

मत पूछो मुझ से मेरे दिल के अफ़साने

मत पूछो मुझ से
मेरे दिल के अफ़साने
की नहीं मोहब्बत जिसने
वो दर्द-ऐ दिल क्या जाने
ना जानते थे ना पहचानते थे
फिर भी
मुस्करा कर देखा उन्होंने
खिला दिए
फूल मोहब्बत के दिल में
दिखा दिए ख्वाब रातों में
क्या कह रही दुनिया
बेखबर इस से
हम हो गए उनके दीवाने
कब मिलेंगे,पास बैठेंगे
बातें करेंगे,मस्ती में झूमेंगे
इस ख्याल में अब डूबे हैं हम
कोई कहेगाबीमार-ऐ-इश्क हैं
क्या होता है इश्क
जिसने किया वो ही जाने
कब बुझेगी आग दिल की
अब खुदा जाने
हमें तो जीना है
इंतज़ार में उनके
आयेंगे या नहीं वो ही जाने

दिन बदला,तारीख बदली

दिन बदला
तारीख बदली
ना धूप बदली ना ही
हवा बदली
ना ही सूरज,चाँद बदला
ज़िन्दगी भी नहीं
बदलती
कभी होठों पर हंसी
कभी आँखों में
नमी होती
निरंतर नए रंग रूप
में आती
आशा निराशा के
भावों से
अठखेलियाँ करती
चैन की उम्मीद में
बेचैनी पीछा नहीं
छोडती

मुझे हक तो नहीं फिर भी नाराज़ हूँ

मुझे हक तो नहीं
फिर भी नाराज़ हूँ
तुमसे
रिश्तों की दुहाई दूं
या जो वक़्त साथ गुजारा
उसकी याद दिलाऊँ
वजह कुछ भी हो
तुम जानती हो तुम्हारी
रुसवाई वाजिब नहीं
मेरी वफाई पर कोई
दाग नहीं
तुमने ही उकता कर
किनारा कर लिया
इलज़ाम बेरुखी का
लगा दिया हम पर
ये भी ना सोचा कभी
तुम्हारे खातिर ही तो
हम खामोश रहते थे
बदनाम ना हो जाओ
इसलिए मिलने की
कोशिश नहीं करते थे


नहीं जानता मैं चाहता क्या हूँ

नहीं जानता
मैं चाहता क्या हूँ
नए लोगों से मिलता हूँ
उन्हें अपना बनाना
चाहता हूँ
पुरानों को अपने साथ
रखना चाहता हूँ
नए जब पुराने हो जाते
चेहरे साफ़ दिखने लगते
मुझे सवालों से घेरते
सच कह देता हूँ
सच पूछ लेता हूँ
चेहरे से पर्दा हटाने की
कोशिश में मुझसे
रुष्ट हो जाते हैं
खुद से लड़ता हूँ
खुद को समझाता हूँ
निरंतर सोचता हूँ
कैसे अपने साथ रखूँ ?
जितना मनाता हूँ
उतना ही दूर होता
जाता हूँ
असली चेहरे को
पहचानने लगता हूँ
नहीं जानता
मैं चाहता क्या हूँ


हँसमुखजी थे पान के शौक़ीन (हास्य कविता)

हँसमुखजी थे
पान के शौक़ीन
खाते थे
पांच मिनिट में तीन
पीक से भर कर
मुंह हो जाता गुब्बारा
होठ हो जाते लाल
कर रहे थे बात दोस्त से
ध्यान था कहीं ओर
किस्मत थी खराब
पूरे जोर से मारी
उन्होंने पीक की पिचकारी
बगल से जा रही थी
एक भारी भरकम नारी
पीक पडी उसकी साड़ी पर
महिला गयी भड़क
पहले तो दी गालियाँ
फिर चप्पल लेकर दौड़ी
डरते डरते हँसमुखजी ने
दौड़ लगाई सरपट
पैर पडा केले के छिलके पर
फ़ौरन गए रपट
महिला ने भी दे दना दन
मारी चप्पल पर चप्पल
कर दिया मार मार कर
हाल उनका बेहाल
हाथ जोड़ कर पैर पकड़ कर
माफी माँगी
और छुड़ाई जान
कान पकड़ कर कसम खाई
जीवन भर अब नहीं
खाऊंगा पान

डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

चाचा! मुझे इतने पसीनें क्यों आ रहे है?


क्या है कि मेरे एक जानकार को एक बिमारी लग गई है हर बार चुनाव
का बिगुल बजते ही उनका मर्ज षुरू हो जाता है और चुनाव के बाद तक जारी
रहता हैं. कई इलाज करा लिए, कई जगह झाड फूॅक कराली, कइयों ने कहा कि
घाटी वाले भैंरूजी के पुजारी सिद्ध महात्मा है उन्हें वहॅा ले गए. किसी ने कहा
कि ‘पीर बाबा के फकीर’ के पास से आजतक कोई नामुराद लौट कर नही
आया, हम वहॅा भी गए, कई कई गन्डें, ताबीज, क्या बाजू में, क्या गलें में बान्ध
कर देख लिए. चौराहंे पर भी खास किस्म की सामग्री रखकर ‘टोटेटका’ कर
लिया परन्तु कुछ फायदा नही हुआ. पहलें वह सपनें में मंदिर-मस्जिद बहुत
चिल्लाते थे लेकिन अब कुर्सी-कुर्सी बडबडाते हैं. हमनें जागने पर उनके सामने
लकडी, लोहंे, प्लास्टिक इत्यादि की कई कुर्सिया’ ला लाकर रखी लेकिन वह उन्हें
फेंक देते है और कहते है कि आपने क्या मुझे पागल समझ रखा है ? अब
आपही बतायें यह हकीकत हम उनको कैसे बतायें ?़ नही बता सकते ना ?
हमनें उन्हें एक हकीमजी को दिखाया. उनका दावा था कि वें एक
खानदानी हकीम हैं. देषकी राजधानी के बीचोबीच गली गजमलखां में उनका
षफाखाना है. कई अखबारों एवॅ पत्रिकाओं में आये दिन उनके विज्ञापन छपते
रहते है ‘षादी से पहले अथवा षादी के बाद’ की तर्ज पर इनके पास कई रोगांे
का षर्तिया ईलाज है इसलिए हिम्मत करके हम अपने इस जानकार को वहॉ ले
गये तथा हकीम जी को इनका सारा वाकया बताया कि इनको ‘चुनुनाव से पहले
तथा चुनुनाव के बाद’ वाले कुर्सी के सपने आते है और यह कुर्सी-कुर्सी बडबडाते
हैं. कभी कभी सत्ता-सत्ता भी चिल्लाते हैं. हकीम जी ने नब्ज देख कर कहा कि
घबराने की कोई बात नही हैं. मर्ज पुराना जरुर है, सन्निपात है, लेकिन लाइलाज
नही है मैंने ऐसे सैकडांे रोगी ठीक किए है हकीम लुकमान का वषॅज हूॅ. अल्लाह
ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा, हमने हकीम जी द्वारा बताई हुई कई युनानी
दवाएॅ उन्हें पिलाई, सिर में बादाम रोगनजोष की मालिष की, लेकिन अफसोस !
उनका मर्ज ठीक नही होना था सो नही हुआफिर
हम उन्हें बंगाली बाबा उस्ताद कालू खॉ वल्द लालू खॉ के यहॉ ले
गए. उनका ठिकाना सराय कालेखां में कूंचा बहरामखां गली में हेैं. वह कालें एवं
सिफली ईल्म के उस्ताद है तथा अपने फन के माहिर है उनका दावा है कि ‘हम
सिर्फ कहते नही करके दिखाते है 24 घन्टे में 100 प्र्िरतिषत गारन्टी के साथ ळाभ
देतेते है’ उनके कहें अनुसार हम कुछ नीबूॅ, थोडी इलाइची एवं दो अगरबत्ती के
पैकिट भी ले गए, ठीक वैसे ही जैसे थानें में एफआईआर, लिखाने के लिए जाते
वक्त स्टेष्नरी लेजानी पडती हैं. हमनें बंगालीबाबा के कहें अनुसार सब कुछ
किया, पैसों से भी लुटे लेकिन हमारें उस जानकारका मर्ज ठीक नही हुआ उल्टा
ज्यांे-ज्यों चुनाव नजदीक आते जारहे है वह बढता ही जा रहा हैंतॉत्रि
क बाबा के यहॉ ही लुटे हुए एॅव धक्के खा रहे एक सज्जन से
पता लगा कि कालभैरव ज्योतिष केन्द्र पर इन्हें ले जाइये वहॉ आपका षर्तिया
इलाज हो जायेगा, वहॅा के ज्योतिषाचार्यजी का दावा है कि पहले सब को जानिए
फिर मुझे मानिए’, वह पॅडितजी विष्वविख्यात तन्त्राचार्य एॅव भविष्यवेत्ता हैं, माने
हुए बाममार्गी हैं. हम तॉत्रिक बाबा से निराष होकर उन्हंे वहॅा ले गए और
आगामी चुनावांे के सन्दर्भ एॅव कुर्सी रोग के बारे में बताया, उन्होंने काफी देर घुमा
फिरा कर बातकी एॅव अपनी फीस चढावा इत्यादि लेने के बाद कहा कि इन पर
षनि की कुदृष्टि हैे तथा षनिकाढैया चल रहा हैं. अगर इन्हें कुर्सी पानी है तो
षनि देवता को राजी करना पडेगा जिसके लिए दो टिन तेल, बीस किलों काली
उडद, तीस किलांे साबित मॅूग, दो भेली गुड, तथा पचास हजार रू देने पडेंगे,
मरता क्या न करता ? हमने वह भी किया, तब तॉत्रिक बाबा ने कुछ दिनों बाद
रहस्योदघाटन किया कि अब इनके ग्रह अच्छे हो गए है अगर यह जातिवाद,
आरक्षण का राग आलापे और दूसरों के दल से निकाले हुए भ्रष्टों को अपने दल
में षामिल करलें तो कुर्सी पा जायंेगे फिर इनका रोग भी ठीक हो जायेगासमस्य
ा का समाधान न होते देखकर एवं विभिन्न समाचार पत्र,
प़ित्रकाओं से सूचना पाकर हम उन्हें एक स्वयॅसिद्व-स्वयॅघोषित-देवी
करूणामयी-ममतामयी मॉ-के पास भी ले गये, वह मॉ बहुत चमत्कारी बताते हैंउनका
आश्रम भी बहुत विषाल है, जहॉ वह साल में कुछ दिन अपने
एयरकन्डीषन अपार्टमेन्ट में रहने के लिए आती है, फिर कभी वह अपने चेलांे के
साथ हरिद्वार, केदारनाथ, कभी दक्षिण की यात्रा पर अथवा विदेषों की सैर पर
निकल जाती हैं. वहां कई एनआरआई उनके चेलें हैं. हमनें किसी तरह उनसे
समय लेकर उन्हें भी दिखाया, उन्होंने पहले तो हमें षरीर-षरीरी, आत्मा-
परमात्मा, प्रकृति-जड-चेतन तथा द्वैतवाद-अद्वैतवाद इत्यादि पर एक लम्बा-चौडा
लैक्चर दिया. वैराग्य के महत्व पर प्रकाष डाला एॅव सारी दुनियॉ को क्षणभॅगुर-एक
क्षण में नष्ट होनेने वाली-बताया फिर कहा कि अच्छा मैं देखती हूॅ कि इनके लिए
क्या किया जा सकता है ? षायद कुछ अनुष्ठान करना पडेगा, नतीजा यह हुआकि
घबराकर हमें वहॉ से भी बैरॅग लौटना पडाकिसी
ने हमें बताया कि आप सब छोडकर इन्हें कालेघोडें की नाल की
अगॅूठी पहनाओ, किसी ने सुझाया कि इन्हें बिहार के गया षहर से खूनी नीलम
की अगूॅठी मगॅवा कर, उसे डेयरी के ‘षुद्ध’ दूध में पवित्र करके बायंे हाथ की
अनामिका में पहनाओ, किसी ने ‘पहाडीबाबा’ के पास जाकर आषीर्वाद लेने के
लिए भी कहा नतीजा यह हुआ कि असमंजस में हम उनकों घर ले आए.
अब वह पांच राज्यों का चुनावी बिगुल बजते ही फिर तरह तरह के
रथांे की मॉग करने लगे है कि मेरे लिए फंला फंला रथ लाओ मैं उस पर सवार
होकर चुनाव रूपी युद्व में उतरूगॅा. अलग अलग नामों की यात्राएॅ करुॅगा. गरीबी
क्या होती है यह देखने किसी गरीब की झोपडी में जाउंगा, भलेही पांच सितारा
होटल से खाना मंगवाउ पर खाउंगा उसी झोपडी में और हो सका तो एक रात भी
वही गुजारूंगा, आखिर गरीबों एवं भिखारियों के बारें में मुझसे ज्यादा ओैर कौन
जानता हैं ? बतानेवालें तो यहां तक बता रहे है कि उन्होंने कहा है कि मजहब
विषेष बाहुल्य इलाकें में जाउंगा तो उसके पहले अपनी दाढी बढा लूंगा, स्थानीय
लोगों की वेषभूषा पहनूंगा, यहां तककि उन्होंने अपने भाषण लिखकर देने वालें को
भी कह दिया है कि उन लोगों की बोली में ही मेरा भाषण लिखकर दे, वही
पढूंगा जानकारों
का विष्वास है कि इससे मर्ज ठीक होने में कुछ मदद मिल
सकती हैं. इससे ‘सर्दी में में भी गर्मी का अहसास’ तो हो जायेगा लेकिन पसीनें नही
आयेंगे
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 98737063339

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

ग्लास चिल्ड्रन


टोकियों में जंमें, दाईसाकु इकेदा सोका गाक्काई के सम्मानीय अध्यक्ष और
सोका गाक्काई इन्टरनेषनल के अध्यक्ष हैं. बौद्ध धर्म के अगुआ, लेखक, कवि
और षिक्षाविद के रूप में एवं बौद्ध धर्म प्रेरित मानवतावाद को केन्द्र में रखकर
उन्होंने षांति, पर्यावरण और षिक्षा के क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं
और इन विषयों पर विष्वविद्यालयों में भाषण दिये हैं. साथ ही वे कई राष्ट्ीय
अंतर्राष्ट्ीय नेताओं और दुनियाके सांस्कृतिक अगुआओं और षिक्षाविदों से
संवादरत रहे हैं. सन 1983 में उन्हें ‘यूनाइटेड नेषन्स पीस अवार्ड’ से
सम्मानित किया गया हैहिन्दुस्तान
में अपनी कई यात्राओं के दौरान, श्री इकेदा ने श्री जयप्रकाष
नारायण, श्री राजीव गांधी और भूतपूर्व राष्ट्पति के, आर. नारायणन से विचारों
का आदान प्रदान किया है और तहे दिल से हमारी समूची पृथ्वी पर षांति और
संपन्नता स्थापित करने के लिए बातचीत की है. उन्हें दुनिया के कई
विष्वविद्यालयों ने सम्मानित ‘डाक्टरेट’ और ‘प्रोफेसरषिप’ से नवाजा है, जिसमें
दिल्ली विष्वविद्यालय द्वारा सम्मानी ‘डाक्टरेट ऑफ लैटर्स’ भी षामिल हैंइन्होंने
सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमे षामिल है, उपन्यास ‘दी
हयूमन रिवोल्यूषन’ और ‘चूज लाइफ’, प्रसिद्ध इतिहासकार ए.जे. टॉयन्बी से
संवाद, ‘अपनी दुनिया आप बदलिये’ इत्यादिप्रस्तुत
लेख उनकी पुस्तक ‘ग्लास चिल्डरन’ से अनुवादित है जिसमें कई
वर्षों पूर्व लिखे गये छोटे छोटे निबंध है जिनमें से कुछ ‘वर्ल्ड ट्ब्यिून प्रेस’ द्वारा
सन 1973 में प्रकाषित किये गए थेहमारे
देष की नवयुवक पीढी द्वारा आए दिन आत्महत्याओं का सहारा
लेना समसामयिक समस्या हैं. आपके माध्यम से इस समस्या एवं उसके
निराकरण हेतु प्रयास किया जाय तो उचित होगा. इसी प्रसंग में यह अनुवादित
लेख आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैंनाजुक
बच्चें ं
लेखक: दाईसाकु इकेदा
हम सभी नव वर्ष का स्वागत हर्षोल्लास से करते हैे. हालांकि प्रत्येक
युवक-युवतियां, स्त्री-पुरूष एवं बच्चों-बूढों की खुषियां अलग अलग प्रकार की
होती है लेकिन सभी की भावनाओं में खुषियों का इजहार रहता हैं विषेषकर
छोटेंछोटें बच्चें इस अवसर पर स्वप्रेरणा से मंगलमय नववर्ष की कामना करते हैंकुछ
लोग इस त्योैहार का लुत्फ उठाने अपने परिवार के साथ विभिन्न
स्थानों का भ्रमण करते हेै तो कुछ घर मंे ही रहकर अपने परिवार के साथ
खुषियां मनाते हेैं. टीवी के विभिन्न चैनल भी इस अवसर पर अपने अपने
विषेष कार्यक्रम दिखाते हैं. ऐसेही एक मौके पर जब मैं अपने परिवार के साथ
खुषियां बांट रहा हंू तो मैं सोचता हंू कि कितना अच्छा हो कि इस मौके पर
हम एक दूसरे को कोई षिक्षाप्रद लोककथा-कहानी सुनाएं मसलन टॉलस्टाय की
‘मूर्ख ईर्ववान’ की कहानी को ही लें. अगर ऐसी ही मिलती जुलती कहानियां सर्वत्र
2
कहीजाय तो जिस तरह के सामाजिक ताने-बाने में आज हम जी रहे है उससे
कही बेहतर वातावरण का निर्माण हमारे इर्द-गिर्द हो सकता हैं. मैं सोचता हूं कि
‘मूर्ख ईर्ववान’ एक ऐसी अमर कथा है जिसकी सर्वत्र आज भी उतनी ही
प्रासंगिकता है जितनी की पहले कभी थीहो
सकता है कि हममें से कई लोगों को यह कहानी पहले से ही ज्ञात होइसके
अनुसार एक देष में एक समृद्ध किसान परिवार में तीन लडकें थे. ईवान
उसमें सबसे छोटा था. उससे छोटी एक गूंगी बहन भी थी. सबसे बडा लडका
सैनिक था. उसकी षादी एक ऐष्वर्यषाली परिवार में हुई थी जो हर बात में
अपनी धाक रखना चाहता था. मंझलें पुत्रका ध्यान हरदम रू.पैसों की तरफ
रहता था. इसके विपरीत ईवान हरवक्त साधारण वेषभूषा में रहता हुआ अपनी
छोटी बहन का ध्यान रखताथा औेर चुपचाप अपनी खेतीबाडी में लगा रहता थासमय
गुजर रहा था लेकिन इस परिवार की खुषी चारजनों के एक
राक्षसदल को नागवार गुजरी. यह चारों हरदम इस युक्ति में लगे रहते थे कि
ईवान और उसके भाइयों में किसी तरह भी मनमुटाव हो औेर उनका परिवार
बर्बाद हो जाय. कहानी तो विस्तार में है लेकिन उसका सारंाष यह है कि ईवान
के दोनो बडे भाई तो राक्षसों की बातों में आ गए लेकिन ईवान पर उनकी बातों
का कोई असर नही हुआ फलस्वरूप जीत ईवान की ही हुई. हालांकि ईवान
दुनियादारी से अनभिज्ञ था लेकिन उसका हर काम सच्चाई एवं ईमानदारी से
प्रेरित होता था. कोई उसके साथ कितनाही दगा करें यह जान लेने पर भी वह
गुस्सा नही करता था उल्टे पलटकर उदारतापूर्वक उसे कहता ‘अरे भाई ! तुम्हें
ऐसा नही करना चाहिए था.’ ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उसका जंम दूसरों के
प्रति क्षमाभावना प्रदर्षित करने के लिए ही हुआ था. इतनाही नही वह धैर्यवान
भी था और कैसी भी कठिन परिस्थितियां हो उससे वह डिगनेवाला नही था,
सचमुच में वह लोककथाओं का नायक था.
ऐसे ही मिलते जुलते चरित्रवान, जो कभी निराष ना हो, जापान की
कथा-कहानियों में भी मिलजायेंगे. हालांकि ईवान समाजके बनावटी एवं
आडम्बरपूर्ण सामाजिक जीवन के विरूद्ध संघर्ष करनेवाला नायक था लेकिन मेरा
मानना है कि ऐसे चरित्र आधुनिक समाज में कम ही देखने में आते हेैंजैसाकि
हम सबका मानना है कि षिक्षा सिर्फ ऐसी ही नही होनी चाहिए
कि वह बच्चों को एक डरपोक एवं सांचे में ढले हुए सिक्कें की तरह बनायें
बल्कि वह उनको सहिष्णुता, मिलनसारिता एवं आगे बढने की ललक इत्यादि गुणों
से भरपूर बनानेवाली हो. कहने का तात्पर्य यह है कि वह उनमें ईवान जेैसी
ईमानदारी एवं अपने कार्य के प्रति लगन सिखाएंमुझ
े यह देखकर बहुत दुख होता है कि आजकल नवयुवकों-युवतियांे द्वारा
आत्महत्याओं की संख्या बढती जा रही है. कुछ नवयुवक छोटी छोटी बातों से
परेषान होकर घर से भाग जाते है जबकि कइयों को हरदम तरह तरह की
मानसिक चिंताएं घेरे रहती है. लगता है जापान अपनी महत्वता और विष्वास
3
खोता जा रहा हेैं. हमारे नवयुवक हमसे दूर होते जा रहे हैंे. इससे हमारे
जापानी सामाज के भविष्य पर भी असर हो रहा है. क्या जापान के वयस्क
लोगों की असफलताओं का असर हमारे नवयुवकों पर भी पड रहा हेै ?
आजकल के नवयुवकों की मुसीबतों के सामने जल्दी ही झुकने की प्रवृति को देख
देखकर मेरे हृदय में बहुत पीडा होती हेै. ऐसा लगता है मानो ये लोग कांच के
बने हुएुए है.ै इनमे दृढता नामकी कोई चीज नही है. ऐसा लगता है कि वे कभी
भी टूट जायेंगे. इसके लिए समाज पर दोषारोपण करना सहज है परन्तु ऐसा
करने से देष का भविष्य नही सुधर जायेगा बल्कि हमें यह देखना होगा कि
गलती कहां है ? औेर हमें इसे दुरस्त करना होगानवय
ुवकों को इतना कमजोर किसने बनाया है ? उन्हें ऐसा क्या
पढाया-लिखाया जा रहा हेै कि वे जीवन की वास्तविकताओं से पलायन कर रहे
है ? इन सब के क्या कारण है ? और कैसे हमें इन्हें सुधारना है ? समाजके
बडें बूडढों को इन सब प्रष्नों पर गम्भीरता से सोचना चाहिए अब केवल चिकनी
चुपडी या थोथी बातों से काम नही चलेगा बल्कि इन समस्याओं पर समुचित
ध्यान देना होगाइस
विषय में एक षिक्षाविद ने मुझे बताया कि आजकल के बच्चें अपनी
रोजमर्रा की जिन्दगी में काफी लापरवाह होते जा रहे है. कुछही बच्चें ऐसे है जो
छोटें छोटें औजार मसलन कैंची अथवा घरेलू चाकू का अच्छी तरह से इस्तैमाल
करना जानते है. बाजार में आधुनिक षार्पनर आजाने से उन्हें चाकूसे पेंसिल
छीलने की आवष्यकता ही नही पडती. इसी तरह उनको कांट छांटकर कोई वस्तु
बनाने के लिए कैंची की आवष्यकता नही होती क्योंकि आजकल बाजार में
प्लास्टिक के बने बनाये ऐसे टुकडें मिल जाते है जिन्हें जोडकर तरह तरह के
खिलौनें बनाये जा सकते हैे. कहने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक सुख
सुविधाओं ने हमारे बच्चों को इन छोटे छोटे औजारों के इस्तैमाल से दूर कर
दिया हैपरन्तु
कुछ षिक्षाविदों का यह भी कहना है कि बच्चों को इन छोटे छोटे
ओैजारों से दूर रहने का एक महत्ती कारण यह भी है कि बच्चों की माताएं
स्वयं ही उनको इन कामों से दूर रखती हैे. उनका कहना है कि अगर बच्चें
इनका इस्तैमाल करेंगे तो उनके चोट लग सकती है. इसका नतीजा यह है कि
बच्चें को अगर कोई फल वगैरह भी खाना है तो उसकी मां उसे छीलकर देती
है. इसमें कोई षक नही कि असावधानीपूर्वक इस्तैमाल करने से चाकू अथवा
कैंची इत्यादि से चोट लग सकती है परन्तु बच्चों को इनसे सावधान करना एक
बात है और उन्हें इस वजहसे कुछ ना करने देना दूसरी बात है. उसी षिक्षाविद
ने मुझे बताया कि जब वह ऐसे बच्चों को देखता है, जिसने कभी किसी फल
वगैरह को इनसे नही छीला, तो उसे बच्चेंकी बजाय उसके माता-पिता की,
जरूरत से ज्यादा परवाह करने की, भावना परही तरस आता हैं4
प्रकृति की ओरसे बच्चें कमजोर पैदा नही होते. यह भी सच है कि
मानवषिषु जंम लेतेही अपने पैरों पर खडा नही हो सकता जैसेकि कई जानवरों
के बच्चें हो जाते है. परन्तु यह भी देखा गया है कि समय पर उचित प्रषिक्षण
देने पर नवजात षिषु भी कम उम्र में ही तैरना सीख सकता हैे. कुछ लोगों का
तो यहां तक कहना है कि बिना प्रषिक्षण के भी नवजात षिषु में इतनी साम्मर्थ
होती है कि वह तैर सकें. यह बात दर्षाती है कि क्रियाषीलता मानव का
स्वाभाविक गुण है. यहां मेरे कहने का यह मतलब बिलकुल नही है कि यह
पढकर लोग अपने नवजात षिषु को तैराने लग जाय. मेरा आषय तो सिर्फ
इतना ही है कि माता-पिता की जरूरत से ज्यादा बच्चों के बचाव की भावना से
उनके नैसर्गिक गुणों पर कुठाराघात होता है जिससे उनका स्वाभाविक विकास
रूक जाता है. नतीजतन ऐसे बच्चें जीवनधारा में अच्छी तरह नही तैर पातेहो
सकता है कि मेरी यह बात कुछ अभिवावकों को अच्छी नही लगे
लेकिन यह भी सच है कि कई मायने में बच्चें इतने आलसी नही होते लेकिन
उनके माता पिता अधिक दुलार में उन्हें ऐसा बना देते हैं. यों वैसे देखा जायतो
आधुनिक जमाने में विज्ञान एवं तकनिकी विकास सम्पूर्ण मानवजाति को ही धीरे
धीरे निकम्मा बना रहा है. हममें से कितने व्यक्ति ऐसे है जिनके पास खुदका
औजारों का किट है जिससे वह मरम्मत का छोटा मोटा काम खुद कर सकें ?
मुझे याद है जब मैं किषोरावस्था में था तब हरदम ही मेरे कही न कही
चोट लगती रहती थी. हालांकि अधिकांष समय मैं पारिवारिक कामों में लगा
रहता परन्तु इसके बावजूद मैं मिटटी कीचड में खेलकूद करता रहता था
नतीजतन मेरे षरीर पर मेरे अन्य साथियों की तरह छोटे मोटे घाव होते रहते
थे. यह वह मुष्किल जमाना था जब अधिकतर लोगों को अपनी वस्तुएं स्वयं
बनानी पडती थी. यही आवष्यकता बच्चों को वस्तुओं के बारे में ज्ञान एवं
उत्साह पैदा करती थी जो आगे चलकर उनकी जिन्दगी में काम आती थीपरन्तु
मुझे आष्चर्य है कि आधुनिक समय की माताएं अपने बच्चों में ज्ञान
एवं उत्साह के लिए क्या कर रही है ? जब बच्चें एक समझदारी की उम्र में आ
जाते हेै तो क्यों नही उन्हें चाकू एवं कैंची जैसी चीजों का भली प्रकार इस्तैमाल
करना सिखाती है. हालांकि साथ ही साथ उन्हें यह भी सिखाना है कि औजारों
का इस्तैमाल करते समय क्या क्या सावधानी रखनी है परन्तु अभिवावक इतना
भी नही करेंगे ओैर इसके बजाय स्वयंही उनका यह काम करते रहेंगे तो यह
उनकी बुद्धिमानी नही कही जायेगीवैसे
देखा जाय तो चाकू या कैंची कोई बहुत बडी बात नही है. असली
बात है इन छोटे छोटे कामों में मातापिता पर निर्भरता. अगर बच्चा जिन्दगी में
छोटी छोटी बातों से भी डरेगा या दिक्कतों से दूर भागेगा या ऐसी आषा रखेगा
कि उसकी मुसीबत को कोई और सहले या कोई औेर आकर उस समस्या को
हल करदे तो ऐसे परिवेष में पला बढा बच्चा बडा होकर जिन्दगी के थपेडों को
आसानी से सहन नही कर पायेगा. रोजमर्रा की जिन्दगी में हम ऐसे कई बच्चों
5
को देखते है जो बोर्ड के इम्तहान देने के वक्त या किसी इन्टरव्यू में जाते वक्त
अपने साथ अपने अभिवावकों को ले जाते है. ऐसेही नवयुवकों को जब जिन्दगी
में समस्याएं घेर लेती है तो ना तो वह उससे दूर भाग सकते है ना ही कोई
दूसरा उसे झेल सकता है तो वह घबराजाते हेैं. मैं जब भी किसी नवयुवक द्वारा
आत्महत्या की खबर सुनता हंू तो मुझे लगता है कि मैं एक ऐसे नवयुवक की
खबर सुन रहा हंू जिसे उसके अभिवावक ने कभी जिन्दगी की नाव को खेना
नही सिखायाबडों
को चाहिए कि वह छोटों को अपने पांवों पर खडे होना सिखायेंपुराने
समय से ही बडे बूढें कहते आए है कि ‘अगर आप अपने बच्चों ं को
प्यार करते है तो उन्हें किसी यात्रा पर भेेिजिये’ हालांकि ऐसा कहते वक्त उन्हें
बहुतसी चिंताएं घेरे रहती हैे बावजूद इसके लोग अपने बच्चों को होषियारी
सिखाने हेतु ऐसा करते आए हैंलेकिन
मुझे नही लगता कि आजकल के अभिवावक ऐसा करेंगे. वह
षायद इतनाही करले तो बहुत है कि वह अपने रोजमर्रा की जिन्दगीमें बच्चों को
स्वयं अपना कामकाज करने की आदत डलवाले परन्तु क्या यह सच नही है कि
वह ठीक इसका उल्टा कर रहे है ? वास्तव में होता यह है कि ठीक अलसुबह
वह उसको उसके हाथों से काम करने से रोकते है तो सांयकाल उसको पैरों पर
चलने से निरूत्साहित करते हेैे, दोपहर को उसे धूप से बचाकर रखने की
कोषिष करते है तो रात्रि को ठन्डी हवा से उसका बचाव करते मिलेंगे. कहने
का तात्पर्य यह है कि वह अपने बच्चों को इस तरह बना देते है कि वह पूर्णतः
छुईमुई का पौधा बनकर रह जाता है ओैर इस तरह परवरिष किए हुए बच्चें का
जब जिन्दगी की वास्तविकताओं से सामना होता हेै तो वह कोई कठिनाई के पूरी
तरह से आने के पूर्वही घबरा जाता हैं. अगर अभिवावक ने उसे कठिन
परिस्थितियों में धैर्यपूर्वक उसका सामना करना नही सिखाया है औेर अगर वह
जिन्दगी में विषम परिस्थिति आने पर आत्महत्या की ओर अग्रसर होता है तो
कही न कही इसके लिए उसके मातापिता भी दोषी हैंउदाहरण्
ाार्थ मानलें कि एक छोटा बच्चा चलते चलते गिर पडता हैे औेर
अगर मातापिता में से कोई फौरनही दौडकर उसे उठा लेता है तो मैं इस तरह
के व्यवहार को बहुत अच्छा नही कहूंगा लेकिन अगर वह उस बच्चें को अपनी
हालत पर योंही छोड देते हेै तो वह भी ज्यादा ठीक नही हेै. सही अभिवावक
वह है जो बच्चें के गिरने की चिंता तो करते है लेकिन साथ ही साथ उसे वापस
अपने आप उठने की प्रेरणा भी देते हैं.
एक बच्चा जो इस तरह गिरता हेै उसे कुछ न कुछ दर्द तो होता ही हैे.
ऐसा होने पर सबसे पहले वह चिल्लाने की तैयारी करता हेै परन्तु इसके पहले
वह अपने मातापिता की तरफ देखता हैे. कहने का तात्पर्य यह है कि हालांकि
उसे कष्ट हुआ हेै लेकिन रोने चीखने के पूर्व वह अपने चारों तरफ देखकर यह
अंदाज लगाता है कि उसे चिल्लाना चाहिए या नही. अगर इस समय आप यह
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कहे कि ओह ! इसके चोट लगी है तो वह जरूर रोयेगा लेकिन अगर उसे यह
सुनाई दे कि ‘कोई बात नही तुमतो बहादुर हो’ तो वह षायद नही रोयेगाहालांकि
यह कोई जरूरी नही कि हरदम ऐसा ही होता है.
ृ यहां मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि मैंने स्वयं अतयंत व्यस्त रहने
के बावजूद अपने तीनों लडकों की परवरिष कैसे की है. सबसे बडा लडका 24
साल का है, मंझला 22का और छोटा 19 वर्ष का है. बडें को आप बुद्धिजीवि
कह सकते है. मंझला उत्साहित एवं हंसमुख है जबकि छोटे को स्कूल के दिनों से
ही नक्षत्र विज्ञान में रूचि है. इस समय वह अपने मित्रों के साथ टोकियो के
दक्षिण में एक द्वीप पर है. उसमे वंषानुगत मछुआरे का खून है. वह समुद्र से
बहुत प्यार करता हैपिछले
मई में एक रोज सुबह सुबह ही वह अपने दोस्तों के साथ समुद्र
की सैर पर निकला लेकिन षीघ्रही उॅची 2 लहरों की चपेट में आने से उनकी
नाव उलट गई और जो बोट उनकी सहायता के लिए पीछे पीछे चल रही थी
उसके इंजिन में उसी वक्त कुछ खराबी आ गई. बच्चें जिन्दगी और मौत के
बीच संघर्ष करते रहे ओैर अंत में वही से गुजर रहे एक जहाज ने उनकी जान
बचाई. इतना कुछ होने के बावजूद मेरे लडके ने घर पर आकर कुछ नही
बताया वहतो उसकी मां ने भांपलिया तब कही जाकर सारी घटना का पता लगा
और उसकी मां ने यह बात मुझे बाद में बताईमुझ
े इस बात से कोई आष्चर्य नही हुआ बल्कि मैं उसकी इस बात से
प्रभावित ही हुआ. मैंने इसके बाद भी कभी यह नही चाहा कि मेरे लडकें कुछ
करने हेतु हरदम मेरी ओर ताकते रहे.
मेरे द्वारा की गई घटनाओं के वर्णन से ऐसा प्रतीत हो सकता है कि
बच्चों की षिक्षा में कही न कही कोई कमी है औेर वह यह कि हममें से
अधिकांष को यही नही मालुम कि आखिर षिक्षा का उद्धेष्य क्या है ? मेरे
विचार से षिक्षा का मूल उद्धेष्य ेष्ेष्य है ‘आत्म निर्भर्ररता’. बच्चें सिर्फ उनके
अभिवावकों की ही धरोहेहर नही है वह समाजकी, राष्ट्क्की सम्पति भी है.ै. उनका
स्वयंकंका एक अलग वर्चसर््स्व है,ै, व्यक्तित्व है जिनका अभी पूर्णर्रूरूपेण विकास नही
हुअुआ हेैे.ै. चूंूंिकि उनकी पूर्ण उन्नति होनेना बाकी है अतः हम सबका कर्तव्य है कि
ऐसे समय में ं उनकी मदद की जाय ओैेरैर इसके लिए जरूरी है कि उन्हें ं
आत्मनिर्भर्ररता की ओर बढने हेतेतु प्रा्रोत्ेत्साहित किया जाय.
जापानी भाषा में षिक्षा का पर्यायवाची षब्द है ‘कइयोकू’ इसमे ‘इयोकू’ का
मतलब है पढाना, उॅचा उठाना. हमारे यहां बसंत ऋतु में बीज बोये जाते हेै
जोकि आगे चलकर पौधें का रूप लेते हैं. किसान उनके आसपास की खरपतवार
को हटाता है, उनको खाद-पानी देता है लेकिन यह तमाम खाद-पानी पौधें स्वयं
जमीन से लेते है. पौधें उगाने का मतलब यह है कि उनके उगने का वातावरण
बनाया जाय ताकि वे स्वयं बडे हो सकें, आत्मनिर्भर बन सकें और इसीसे यह
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जापानी षब्द ‘कयोकू’ बना है जिसका मतलब है कि आत्मनिर्भरता का पाठ
पढानाअगर
हम षिक्षा का मूल उद्धेष्य आत्मनिर्भरता बनाले तो उसके तौरतरीकें
बिलकुल स्पष्ट होजायेंगे. हालांकि इस विषय पर काफी परिचर्चा हुई है कि बच्चों
के विकास हेतु कुछ साहसिक कदम उठाये जाय या कुछ और तरीकें इस्तैमाल
किये जाय. इस बात पर काफी वादविवाद भी हुआ है लेकिन मेरा मानना है कि
तरीकों में भलेही मतभेद की गुंजाइष हो लेकिन उद्धेष्य के प्रति कोई मतभेद नही
हैंषिक्ष्
ाा का मूल उद्धेष्य आत्मनिर्भरता ही है. इस उद्धेष्य की पूर्ती हेतु जहां
बच्चों को सघन प्रषिक्षण दिया जाना चाहिए वहां यह भी आवष्यक है कि हम
उन्हें अपने पैरों पर खडा होने के योग्य बनने के लिए वातावरण भी निर्मित
करें. कहने का तात्पर्य यह है कि जब उनकी स्वयं निर्णय लेने की अवस्था प्राप्त
हो उसके पहले उन्हें कठोर अनुषासन में रखा जाना आवष्यक है. ज्यों2 वह
बडें हो उन्हें स्वयं निर्णय लेने की प्रेरणा देनी चाहिए.
परन्तु बहुधा वास्तविक जीवन में हमे ठीक इसका उल्टा होता नजर आता
हेै. जब बच्चा छोटा होता है, अभिवावक उसको मनमानी करने देते हैे लेकिन
अचानक ही एक दिन हम उस पर प्रतिबंध थोपने की कोषिष करते है तब तक
बहुत देर होचुकी होती है. ऐसी परिस्थितियों में उसमें आत्मनिर्भरता की भावना
आने की सम्भावना कम ही रहेगीबच्चें
हालांकि छोटे होते है लेकिन उनमें सीखनेकी प्रबल इच्छा होती हैजो
बात कोई वयस्क सीखने में वर्षों लगा देता है एक बच्चा उसे एक दिन में,
एक महीने में अथवा एक साल में ही सीख सकता हैे और चूंकि वह पूर्वाग्रस्त
नही होता इसलिए सीखी गई बात वह हृदय से ग्रस्त कर लेता है जिसे निकालना
बहुत मुष्किल हैंबच्चें
हर बात में और किसी भी बात में दिलचस्पी ले सकते है. उनकी
दिलचस्पी विवेक रहित होती है. यहां अभिवावक उनकी मदद कर सकते हैेबच्चा
जो भी कहता है माता-पिता उसे ध्यानपूर्वक सुनकर उस पर अपनी
प्रतिक्रिया जाहिर कर सकते है कि क्या उसके हित में है और क्या अहित में
और उसी अनुसार कार्यवाही कर सकते हैइस
तरीके से प्रयास करने से बच्चें का दिमाग ढलने लगता है और धीरे
धीरे उसके व्यक्तित्व का विकास होने लगता है. बेषक इसके साथही बच्चें के
स्वयं के जंमजात गुण, वातावरण इत्यादि का प्रभाव भी होगा परन्तु अभिवावकों
का प्रभाव भी काफी महत्वपूर्ण होता हैंअगर
बच्चें को आत्मनिर्भर बनाना है तो उसे इसके लिए समझदारी दी
जानी चाहिए और यह समझदारी आयेगी जानकारी से, इसके लिए उसके
स्वाभाविक गुणों को विकसित करना होगा. निसंदेह यह सब गुण हरदम
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सर्वोत्कृष्ट रूप में प्राप्त नही किए जा सकते लेकिन अच्छे से अच्छा प्राप्त
करनेका प्रयत्न तो किया ही जाना ही चाहिए.
मैं यहां पर जोर देकर कहना चाहूंगा कि अगर आप बच्चें का सर्वांगीण
विकास करना चाहते है तो आपको उसे ऐसा माहौल देना होगा जोकि काम में
दिलचस्पी एवं प्रतिस्पर्द्धा से भरपूर हो ताकि वह स्वयंमेव आनेवाली कठिनाइयों
को पार करना सीखें और आगे बढेंजब
षिक्षा का उद्धेष्य आत्मनिर्भरता होता है तब अनुषासन का एक
अलगही अर्थ होता है. तब वह सिर्फ ‘यह करो, यह मत करो’ तकही सीमित
नही रहता बल्कि वह बच्चें को सकारात्मक सोच के साथ प्रयत्न करते हुए आगे
बढनेकी प्रेरणा देता है. उदाहरणार्थ मानलें बच्चा कोई ऐसा काम कर रहा है
जिससे कि दूसरों को परेषानी हो रही हो तब सिर्फ उसे षाब्दिक रूपसे मना
करने से ही काम नही चलेगा बल्कि उसे यह सिखाना होगा कि वह यह काम
बंद करके सामनेवाले से क्षमा याचना करें तभी वह अपनी आत्मा की आवाज के
अनुसार आगे बढेगाआप
सोच रहे होंगे कि मैंने यह लेख नव वर्ष के उत्सव की बात करते
हुए प्रारम्भ किया था ओैर उसका समापन बालकों की षिक्षा के विषय पर बात
करते हुए कर रहा हूं परन्तु दोनों में संबंध है. जैसेकि नव वर्ष का उत्सव
सालका प्रारम्भ है तो बालकपन जीवन की षुरूआत है. हमें यह नही भूलना
चाहिए कि यह प्रारम्भिक अवस्थाही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है इसी से संस्कारों
का एक बडा हिस्सा बनता हैंसदा
की भांति इस वर्ष भी संसार में नव वर्ष के महोत्सव मनाएं जायेंगे.
ऐसे समय प्रार्थना करते वक्त हम किसी षैतान से डरकर सिर्फ ऐसी ईष प्रार्थना
में ही ना लगे रहे कि वह हमें अमुक अमुक वरदान देदें ताकि हमें कुछ परिश्रम
नही करना पडे अर्थात परिश्रम से बचाते हुए भाग्य परही निर्भर ना बनादें. हम
ईष्वर से ऐसे समाज के निमार्ण की प्रार्थना करें जहां परिश्रम का महत्व हो, जहां
हर कोई सिर्फ दूसरों की मदद की ओर ही नही ताकता रहे बल्कि अच्छे से
अच्छा ऐसा काम करे जो स्वयंहित के साथ साथ दूसरों के हित का भी हो और
अगर हम ऐसा कर सके तो इस महोत्सव में चार चांद लग जायेंगे
अनुवादक
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 98737063339

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

शहर देहली का हाल


'...अब मैं आपको देहली का पूरा पूरा हाल सुनाता हॅू, तब आप स्वयं
समझ सकेंगे कि यह षहर सुंदर है या नही, प्राय: चालीस वर्ष हुए वर्तमान
बादषाह के पिता षाहजहॉ ने अपने स्मृति चिन्ह के लिए पुरानी दिल्ली के निकट
एक नया षहर बसाया और अपने नाम के अनुसार इस षहर का नाम
षाहजहानाबाद व जहानाबाद रखा, इसके राजधानी बनाए जाने का कारण यह
प्रकट किया गया कि गरमी की अधिकता के कारण आगरा बादषाह के रहने योग्य
नही है पर इसके बनाने के लिए सब चीजें पुरानी देहली के आसपास के खंडहरों
में से ली गई है इससे विदेषी आदमियों को पुराने और नए षहर में कोई भेद
नही मालुम होता, भारत में लोग इसे जहानाबाद ही कहते है, पर सरलता के लिए
मैं भी विदेषियों की तरह इन्हें एक ही कहूंगा.
षहर देहली चौरस जमीन पर जमुना के किनारे जो ल्वायर-फ्रांस-नदी के
समान है- चन्द्राकार बसा हुआ हैं. नदी को छोड कर -जिस पर नावों का पुल
बंधा है- बाकी तीनों ओर रक्षा के लिए पक्की षहरपनाह बनी हुई हैं. अगर इन
बुरजों पर से जो षहरपनाह के किनारे सौ सौ कदमों पर बने हुए है या उस
कच्चें पुष्तें पर से, जो चार या पांच फ्रांसीसी फुट उंचा है, देखा जाय तो यह
षहरपनाह बिलकुल ही अपूर्ण है क्योंकि न तो इसके निकट कोई खाई है ओर न
कोई दूसरा रक्षा का उपाय है.
यह षहरपनाह नगर और किलें को घेरे हुए है तथा उसकी लम्बाई इतनी
अधिक नही है जितनी लोग समझते है क्योंकि तीन घन्टे में मैं उसके चारों ओर
फिर आया हॅू, मेरे घोडें की चाल एक फ्रांसीसी लीग या तीन मील प्रति घन्टे से
अधिक न थी, मैं इसमे षहर की आस पास की उन बस्तियों को नही मिलाता जो
बहुत दूर तक लाहौरी दरवाजें की ओर चली गई्र है और न पुरानी देहली के उस
बचे हुए बडे भाग को, और न उन तीन चार बस्तियों को मिलाता हॅू जो षहर के
पास है क्योंकि इन्हें भी उसी में मिला लेने से षहर की लम्बाई इतनी बढ जाती है
कि यदि षहर के बीचो-बीच एक सीधी रेखा खींची जाए तो वह साढे चार मील
से भी अधिक होगी, यद्यपि बाग आदि के बीच में आजाने के कारण मैं नही कह
सकता कि नगर का ठीक ठीक व्यास कितना है फिर भी इसमे सन्देह नही कि वह
बहुत ही अधिक हैकिला
जिसमें षाही महलसरा और मकान है और जिनका वर्णन मैं आगे
चल कर करूंगा अर्द्ध गोलाकार-सा है, इसके सामने जमुना नदी बहती है, किलें
की दिवार और जमुना नदी के बीच में एक बडा रेतीला मैदान है जिसमें हाथियों
की लडाई दिखाई जाती है और अमीरों, सरदारों और हिन्दु राजाओं की फौज
बादषाह को देखने के लिए खडी की जाती है जिन्हें बादषाह महल के झरोखों से
देखा करता हैंकिलें
की दिवार अपने पुराने ढंग के गोल बुर्जों के कारण षहरपनाह से
मिलती-जुलती हैं. यह ईंट और लाल पत्थर की बनी हुई है जो संगमरमर से
मिलता जुलता होता हैं. इसलिए षहरपनाह की अपेक्षा यह अधिक सुन्दर हैं. यह
षहरपनाह से उंची और सुदृढ भी हैं. इस पर छोटी छोटी तोपे चढी हुई है
जिनका मुंह नगर की ओर हैं. नदी की ओर को छोड कर किलें के सब ओर
पक्की और गहरी खाई बनी हुई हैं. इसके बांध भी मजबूत पत्थर के बने हुए हैं.
यह खाई हमेषा पानी से भरी रहती है और इसमे मछलियां बहुत अधिकता से हैे
यद्यपि यह इमारत देखने में बहुत दृढ मालुम होती हेै पर वास्तव में यह दृढ नही
है औेर मेरी समझ में एक साधारण तोपखाना इसे गिरा सकता हैंइस
खाई के निकट एक बडा बाग है जिसमें बहुत सुन्दर और अच्छे फूल
होते हैं. किले की लाल रंग की दिवार के सामने होने के कारण यह बाग बहुत ही
सुन्दर मालुम होता हैं. इसके सामने एक बादषाही चौक है जिसके एक ओर किलें
का दरवाजा हैे और दूसरी ओर षहर के दो बडे बाजार आकर समाप्त हो जाते
है, जो नौकर राजे प्रति सप्ताह यहां चौकी देने आते है उनके खेमें आदि उसी
मैदान में लगाए जाते हैं. इसी स्थान पर तरह तरह की चीजों की बिक्री के लिए
गुजरी लगती हैइन
दो बडे बाजारों की चौडाई जो चांदनी चौक में आ कर मिलते है
पच्चीस या तीस कदम हैं. जहां तक दृष्टि पहुंचती है वे सीधे ही चले जाते हैंइनमें
से जो बाजार लाहौरी दरवाजे की ओर गया है वह बहुत ही लम्बा हैं. दोनों
रास्तों पर मकान तथा इमारतें समान ही हेैं. पेरिस के प्रसिद्ध बाजार पैलेस रायल
की तरह इन बाजारों के दोनों ओर की दुकानें महराबदार है पर इनमें भेद इतना
ही है कि एक तो यह ईटों का बना हुआ है और दूसरे यह एक ही खंड का हैंइन
दुकानों की छतें खास चबूतरों का काम देती हैं. एक भेद और है, पैलेस
रायल की दुकानों के बरामदें ऐसे बने हैे कि इनमें प्रवेष करने पर मनुष्य बाजार
में एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा सकता है पर यहां की दुकानों के बरामदें
अलग अलग होते हेै और उनके बीच मे दिवारें बनी होती हैं. दिन के समय यही
बैठकर व्यापारी और सर्राफ अपना अपना काम करते है और ग्राहकों को माल
दिखाते हैं. इन बरामदों के पीछे असबाब आदि रखने के लिए कोठियां बनी हुई है
जिनमें रात के समय सारा असबाब रख दिया जाता हेैं. इनके उपर व्यापारियों के
रहने के लिए मकान बने हुए है जो बाजार में से देखने पर बहुत ही सुन्दर
मालुम होते हैं. यें मकान हवादार होते है और धूल बिलकुल नही आती, यद्यपि
षहर के भिन्न भिन्न भागों में भी दुकानों के उपर इसी प्रकार के मकान होते है
पर वे इतने छोटे और नीचे होते है कि बाजार में से भली भांति दिखाई भी नही
देते, अधिकतर व्यापारी दुकानों पर नही सोते वरन रात को काम कर चुकने पर
अपने अपने मकानों को जो षहर मे होते है, चले जाते हैंइनके
अतिरिक्त पांच और बाजार हैं. यद्यपि इनकी बनावट आदि वैसी ही
हेै पर वे इतने लंबे ओैर सीधे नही हेै और भी छोटे बडे बाजार है जो एक दूसरे
को काटते हुए चले जाते हेै, यद्यपि उनके सामने वाली ईमारत महराब के ढंग की
है तथापि वे ऐसे लोगों के हाथ से बने हुए होने के कारण जिन्हें इमारत के सुडौल
होने का ध्यान ही नही था, इतने सुन्दर, चौडे और सीधे नही है जितने वह
बाजार हेै जिनका वर्णन मैंने अभी किया है.
षहर के गली कूचों में मनसबदारों, हाकिमों और धनिक व्यापारियों के
मकान है और उनसे भी बहुधा अच्छे और सुन्दर है पर ईट या पत्थर के बने
मकान बहुत ही कम और कच्चे या घास फूस के बने अधिक हैं., इतना होने पर
भी वे सुन्दर और हवादार हेै, बहुत से मकानों में चौक और बाग होते हेै जिनमें
सब प्रकार की सुख सामग्री उपलब्ध रहती है, जो मकान घास फूस के बने होते है
वहां भी अच्छी सफेदी की हुई होती हैंअमीरों
के मकान प्राय: नदी के किनारे और षहर के बाहर हैं. इस गरम
देष में वही मकान अच्छा समझा जाता है जिसमें सब प्रकार का आराम मिले और
चारों ओर से विषेषकर उत्तर से अच्छी हवा आती हो, यहां वही मकान अच्छे
कहे जाते है जिनमे एक अच्छा बाग, पेड और दालान के अन्दर या दरवाजे में
छोटे छोटे फव्वारें और तहखाने होंगर्मी
के दिनों में देषी खरबूजें बहुत सस्ते मिलते है पर ये कुछ अधिक
स्वादिष्ट नही होते, हां जिनके बीज ईरान से मंगवाया और बोया जाता है बहुत
अच्छे होते हैंगर्मी
के दिनों में आम यहां बहुत सस्ते और अधिकता से मिलते हैे पर
देहली में जो आम होता हैे वह न तो ऐसा अच्छा ही होता हैे और न बुरा, सबसे
अच्छा आम बंगाल, गोलकुन्डा और गोवा से आता हेै जो वास्तव में बहुत अच्छा
होता हेैं. तरबूज यहां बारहों मास रहता हेै, पर जो तरबूज देहली में पैदा होता हैे
वह नरम और फीका होता हैं.
षहर में हलवाइयों की दुकानें अधिकता से हेै पर मिठाई उनमें अच्छी नही
बनती. उन पर गर्द पडी होती है और मक्खियां भिनभिनाया करती हैं. नानबाई
भी बहुत है पर यहां के तन्दूर हमारे यहां के तन्दूरों से बहुत ही भिन्न और बहुत
बडे होते है और इसी कारण न तो रोटी अच्छी होती है और न भलीभांति सेंकी
हुई पर जो रोटी किलें में बिकती है वह कुछ अच्छी होती हैंजुम्मा
मस्जिद:- किले का वर्णन छोड अब मैं फिर षहर की ओर फिरता हूं
जिसकी दो इमारतों का हाल अभी तक लिखना बाकी हैं. उनमें से एक तो बडी
मस्जिद है जो षहर के बीच में एक उॅची पहाडी पर बनी होने के कारण दूर से
दिखाई देती हैं. इसके बनाने से पहले पहाडी की जमीन बिलकुल साफ और चौरस
खोदी गई थी और चारों ओर मैदान कर दिया गया था जहां चारों ओर से चार
बाजार आकर मिलते है, उनमें से एक तो सदर दरवाजे के सामने है औेर दूसरा
पीछे को और बाकी दोनों ओर के दरवाजे के पास. अन्दर जाने के लिए तीनों
ओर पत्थर की 25-25 सुन्दर सीढियां बनी हुई है और पीछे की ओर साफ
करके पहाडी की उंचाई तक पत्थर लगा दिए गए हेै जिनसे वह इमारत और भी
सुन्दर हो गई हैं. इसके तीनों दरवाजें बहुत सुन्दर लाल पत्थर के बने हुए हैे और
उनके किवाडों पर तांबे या पीतल की पत्तियां जडी हुई है, सुन्दर दरवाजा जिस
पर संगमरमर की छोटी छोटी बुर्जियां बनी हुई है, बहुत ही खूबसूरत हैं. मस्जिद
के पिछले भाग में तीन बडे बडे गुंबद है जो संगमरमर के बने हुए हैं. बीचवाला
गुंबद कुछ अधिक बडा और उंचा हैं. मस्जिद के केवल इसी भाग के उपर छत
बनी हुई है और इसके आगे सदर दरवाजे तक बिलकुल खुला हुआ हैे जो गर्मी
के कारण खुला रखना आवष्यक हैं. मस्जिद के अन्दर संगमरमर ओैर बाहर लाल
पत्थर की सिलें जमीन मे जडी हुई है.
यहां की दूसरी वर्णन करने योग्य इमारत बेगम सराय या कांरवा सराय है
जो षाहजहां की बडी बेटी-बेगम साहिबा, जहांआरा- ने गत लडाई के समय
बनवाई थी. पैलेस रायल की तरह यह भी एक बडी महराबदार चौकोर इमारत हैंइसमें
लगातार कोठडियां बनी हुई है और उनके आगे अलग अलग बरामदें हैं.
यह इमारत दो खंडों की है और नीचे के खंड की तरह उपर के खंड में अलग
अलग कोठरियां और बरामदें हैं. ईरानी तथा विदेषी अमीर व्यापारी इसे सुरक्षित
समझकर यही आ कर ठहरते हैंबस्ती:-
मैं नही कह सकता कि देहली औेर पेरिस की जनसंख्या में क्या
समानता है पर फिर भी मेरी समझ में यदि देहली में पेरिस से अधिक आदमी
नही है तो कम भी नही हैंदेहली
के आसपास की भूमि बहुत ही उपजाउ हैं. इसमें चावल, गेंहू, गन्ना,
नील, मंूग और जौ आदि जो वहां के लोगों का प्रधान भोजन हैे, अधिकता से
उत्पन्न होते हेैं. आगरे की ओर जो सडक गई है उस पर देहली से प्राय: छह
मील पर एक स्थान है जिसे मुसलमान ख्वाजा कुतुबउद्धीन कहते हैं. यहां एक
बहुत ही प्राचीन इमारत है जो कदाचित पहले मंदिर था, जिस पर एक लेख खुदा
है जो बहुत प्राचीन मालुम होता हैं. उसकी लिपि किसी से पढी नही जाती और
उसकी भाषा भारत की सब प्रचलित भाषाओं से भिन्न हैंदेहली
से आगरे तक जो डेढ या पौने दो सौ मील लंबी सडक चली गई है
उस पर फ्रांस की तरह आपको कोई अच्छी बस्ती न मिलेगी हां केवल मथुरा एक
पुराना नगर है जिसमें एक बडा और प्राचीन मंदिर-द्वारकाधीष-अब तक विद्यमान
हैंनेषनल
बुक ट्स्ट, इंडिया द्वारा प्रकाषित 'बर्नियर की भारत यात्राÓ से साभार.
फैंव्किस बर्नियर एम.डी, जोकि पेषें से डाक्टर थे, मुगल बादषाह, षाहजहां के
जीवन के अंतिम चरण-सत्रहवी षताब्दी- में फ्रांस से भारत आए थे. प्रस्तुत वृतांत
उसी पुस्तक से लिया गया हैं. अब जबकि दिल्ली को राजधानी का दर्जा प्राप्त हुए
एक सौ साल-11.12.1911 से- होगए है उसी उपलक्ष में यह 'हाले दिल्लीÓ
आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

जियारत में हास्य


हमारें देष में विभिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न किवदंतियां प्रचलित हैं. मसलन
राजस्थान के हाडौती क्षेत्र के बारें में मषहूर है कि त्रेतायुग में जब श्रवणकुमार अपने
माता-पिता को कांवड में बैठाकर तीर्थयात्रा करवाता हुआ उधर से गुजरा तो उसे झुंझलाहट
आगई. कहते है कि उसने कांवड जमीन पर रखदी और चल दिया लेकिन ज्योंहि वह उस
क्षेत्र के बाहर आया उसे अपनी जिम्मेवारी का अहसास हुआ औेर वह वापस कांवड लेकर
यात्रा पर रवाना हुआ. कई संत यह बात पंचवटी के लिए भी कहते है जहां सतयुग में
भवानी ने षिवजी की बात नही मानी औेर त्रेता में सीता माता ने मारीच प्रकरण में लक्षमण
की बात की उपेक्षा की. कहते है कि यही बात अजमेर षहर के लिए कही जाती हैं कि कोई
भी व्यक्ति चाहे वह यहां तिजारत-व्यापार-करने आएं चाहे जियारत-धार्मिकयात्रा-और चाहे
घूमने वह अपने साथ चंद लहमें मुस्कराहट के लाता भी है और अपनों परायों में बांटने हेतु
यहां से तवर्रूख-प्रसाद-के रूप में ले भी जाता हैंहर
साल यहां प्रसिद्ध सूफीसंत ख्वाजा मोइनुद्धीन चिष्ती का उर्स होता है जिसमें
भाग लेने हेतु दूर दूर से जियारती आते हैं. एक बडा जत्था पाकिस्तान से भी आता हैं जिसे
पुरानीमंडी के एक स्क्ूल में ठहराया जाता हैं. यह बात पाकिस्तान जाकर बताने पर वहां
कइयों को इस बात का गिला-षिकवा रहता है कि भारत की हकूमत हमारें लोगों को नई की
बजाय ‘पुरानीमंडी’ में क्यों ठहराती हैं ?
सन 1965 में भारत-पाक के बीच दूसरा युद्ध हुआ था. उस लडाई में पाकिस्तान
को सबसे ज्यादा नुकसान खेमकरण सैक्टर में हुआ. उसे जान माल का तो नुकसान हुआ
ही भारतीय फौज ने अमेरिका निर्मित उसके कई पैटन टैंक जब्त कर लिए जबकि वहां की
हकूमत ने अवाम को यह बताया कि भारत ने हमारें पैटन टैंक चुरा लिए हैं. खैर, ऐसा ही
एक टैंक अजमेर में बजरंग गढ के नीचे प्रदर्षन हेतु रखा गया हैं. एक बार उर्स के मौकें
पर आया पाकिस्तानी जियारतियों का दल जब बारादरी पर घूमते 2 बजरंग गढ के नीचे से
निकला तो उसे वहां पैटन टैंक दिखाई दिया. उनमें से कइयों का माथा ठनका, अरे !
इन्होंने तो हमारा टैंक चुराकर सरेआम यहां रखा हुआ है, ‘चोरी और सीना जोरी’ चलकर
पुलीस में ‘काबिल तव्वजों इत्तला’ यानि एफआईआर लिखवानी चाहिए. बाद में उस दल के
नेताने उन्हें किसी तरह समझाया कि चोरीकी रपट उस थाने में होती है जहां से माल गया
है अतः रपट यहां नही पाकिस्तान में होगी और पुलीस चाहेगी तो तफसीस-जांच- भी वही
होगी, तब कही वह माने.
यह तब की बात है जब रेडियों ही ज्यादा चलते थे. टीवी का प्रचलन ज्यादा हुआ
नही था. उन्ही दिनों जब एक पत्रकार पाकिस्तान की यात्रा पर गया तो उसने वहां देखा कि
घर घर रेडियों पर दिल्ली स्टेषन चल रहा हैं. पाकिस्तानियों का भारत के प्रति प्रेम देखकर
वह बडा खुष हुआ. उसने जिज्ञासावष एक व्यक्ति से इसका कारण पूछा तो उसने बताया
कि हमारें हुक्मरान का यह कहना है कि हम भारत का वैसे तो कुछ बिगाड नही सकते, इस
तरह दिल्ली स्टेषन बजा बजाकर कम से कम उनकी बिजली तो खर्च करही सकते हैं.
1971 की जंग की बात हेैं. वैसेतो जनरल याहियाखां को पीने पिलाने वगैरह से ही
कहां फुरसत थी फिर भी एक रोज उन्होंने अपना रेडियो सुन लिया तो जनरल टिक्काखां
को फोन लगाया और बोले कि अपना रेडियो ये क्या खबरें दे रहा है कि भारत की दो
राजधानियों में दहषत बैठी हुई है ? इस तरह की गलतियों से हमारी जगहंसाई होती हैंइस
पर टिक्काखां ने उत्तर दिया ‘आपने ही स्टेंडिग ऑर्डर दे रखा है कि दुष्मन का
नुकसान बताते वक्त दो से गुणा कर दिया करोजब
टीवी का जमाना आया तो षुरू षुरू में पाकिस्तान में अधिकतर की यह ख्वाइष
थी कि ‘कष्मीर की कली’ पिक्चर देखने को मिल जाय क्योंकि वैसे तो इस जंम में कष्मीर
की झलक देखने को मिलना मुष्किल ही हेै इस बहाने कम से कम कष्मीर तो देख ही लेंगेवैसे
भी भारत सरकार हमें कष्मीर का वीजा तो कभी देती नही जबकि हमारें नौजवान जो
पीओके के मुजफराबाद, गिलगित और चित्राल के कैम्प अटैन्ड करके आएं हेै, हमेषा कहते
रहते है कि कष्मीर जाने के लिए वीजा की नही ऐके 47 की जरूरत होती हैं, हमतो वही
लेकर आते-जाते हैंउर्स
के दौरान दरगाह के आस पास के इलाकों में होटलें, रेस्टोरेन्टस दिनरात खुले
रहते हैं. इनकी खास बात यह है कि इनमें खाने का ‘मीनू’ होटल के अंदर कार्ड पर नही
दुकान के बाहर लगे बोर्ड परही लिखा रहता हैं. एक बार कुछ पाकिस्तानी जायरीन बाहर
बोर्ड पर ‘कष्मीरी पुलाव’ लिखा देखकर होटल मकीना पहुंचें. पहले उन्होंने एक प्लेट ‘मटन
पुलाव’ का आर्डर दिया. जब बैरा ‘मटन पुलाव’ लेकर आया तो उन्होंने देखा कि उसमें
सिर्फ चावल ही चावल है, मटन का एक भी दाना नही हैं. जायरीनों ने बैरे से इसकी
षिकायत की तो वह बोला कि इसको यहां ‘मटन पुलाव’ ही कहते हैं. आप नाम पर मत
जाइये, अगर आप कष्मीरी पुलाव मंगायेंगे तो इसका मतलब यह थोडे ही है कि मैं उसमें
आपको कष्मीर डालकर ला दूंगा. कष्मीर को लेकर यहां भी उन जायरीनों को बडी निराषा
हुई. यहतो बाद में नयाबाजार से उन्होंने एक के दो देकर जब तथाकथित ‘कष्मीरीषाल’
खरीदी तब उन्हें लगा कि पाकिस्तान जाकर बताने के लिए कष्मीर नामकी कोई चीज तो
मिली.
यह तबकि बात है जब तक अमेरिका ने पाकिस्तान की फौजी छावनी एबटाबाद में
ओसामा बिन लादेन का ‘षिकार’ नही किया था. हुआ यहकि उर्स में लंगरखाने की गली
स्थित होटल सकीना में जायरीन बैठे हुए थे. खाना-पीना चल रहा था. संयोग की बात है
कि उस होटल में एक षामलाल नामक बैरा भी काम करता था. जब जायरीन खा-पी चुके
तो वह लोग उठकर मैनेजर के पास गए और पेमेंट बाबत पूछने लगे तो मैनेजर ने वही से
बैरे को आवाज लगाई ‘ओ सामा बिल लादें’ उसका इतना कहना था कि होटल में
अफरा-तफरी मच गई. कोई इधर भाग रहा है कोई उधर. जब कुछ देर बाद लोगों को
असल बात समझ आई तब षांति हुई. पुलीस तो इस घटना के काफी देर बाद आईपाकिस्तान
का एक मषहूर बैंक है हबीब बैंक. एक बार उनके एक अधिकारी दरगाह
की जियारत करने आए. उन्होंने बातों ही बातों में बताया कि लाहौर में हबीब प्लाजा स्थित
उनके बैंक की रीजनल षाखा में एक क्लर्क बदली होकर आया. उसके पहले वह ग्वालमंडी,
अनारकली, कलमा चौक इत्यादि षाखाओं में काम कर चुका था. रोजाना घर से खाना
बनवाकर लेजाना और दोपहर में अपनी ब्रांच में कही बैठकर खाना खा लेना, यही उसका
रूटिन था. जब रीजनल ऑफिस में ट्ंासफर होगया तो खाना खाने के लिए वह ऑफिस के
कैम्पस में एक पेड की ब्रांच पर बैठकर ही खाना खाता था क्योंकि ब्रांच पर खाना खाने की
आदत हो गई थी, तभी तो कहते है कि आदमी की आदत आसानी से छूटती नही हैं. उसी
अधिकारी ने यह भी बताया कि यहां की हकूमत हमारें साथ भेदभाव बरतती हैं. जब हम
उन्हें हमारें एक सौ रू. देते है तो बदले में वह हमें यहां के पचास रू. देती हैं.
क्वेटा से आए एक बुजुर्ग खां साहब चाय पीते अपने अनुभव एक खादिम से अपने
घर गृहस्थी की बातें करने लगे. बोले, उम्रेदराज होने से याददाष्त कमजोर हो रही हेै, जब
रवाना हो रहा था तब बेगम को जरूरी 2 बातें बतानी थी. परन्तु अखबार वालें का बिल
नही मिल रहा था तो खादिम सैयद हुसैन ने पूछ लिया कि खां साहब ! वहां क्या
अखबारवालें बिलों में रहते है ? लाहौर का ‘डॉन’-इंगलिष डेली-पहले तो ऐसा नही था,
अब क्या होगया हैं ? कहते है कि ‘जीओ’ टीवी भी काफी हिम्मतवाला हैंउर्स
पर जहां दूर दूर से किन्नर, जेबकतरें, फकीर आते है वही बनारस के ठग भी
पीछे नही रहते. इनके अलग अलग क्षेत्रों के लाखों के ठेकें छूटते हैं, जैसे मदारगेट, रेलवें
स्टेषन, बस स्टैन्ड, इंदरकोट एरियां इत्यादि. एक बार मदारगेठ पर चम्पासराय के पास एक
जायरीन घंटाघर को देख रहा था तभी एक ठगने उसके पास आकर पूछा, ‘...भाईजान !
कहां से तषरीफ लारहे हो ?’ ‘...अहमदाबाद से आएं हैं.’ जायरीन बोला.
...अहमदाबाद में कहां ?
...दरियापुर.
...क्या काम करते हो ?
...कपडा मार्किट में अपुनकी दुकान है. ख्वाजाकी मेहरबानी से सब मजे में हैंे
...घंटाघर पसंद आया ?
इस पर जायरीन ने हां भरी तो ठग बोला कि अंग्रेजों के जमाने का हैं. आजकल
ऐसी चीजें मिलती कहां है ? नक्की-पूरें-135 फुट का हैं. खरीदोंगे ? सस्ता लगा देंगेजाय
रीन ने कहा कि ठीक भाव लगाओंगे तो लेलेंगे, पर नाप कर देना पडेगा. भाव तय
होजाने पर जायरीन ने उसे पैसे दे दिए और वह रकम लेकर जाने लगा तो जायरीन ने उसे
कहा नपवायें बिना क्यंाति जाओछो ? इस पर ठग ने कहा कि मैं फीता लेकर आता हूं तब
तक तुम यही रहना, ऐसा नही हो कि पीछे से कही चले जाओ. जायरीन मान गया लेकिन
काफी इंतजार के बाद भी ठग वापस नही लौटाजाय
रीन समझ गया कि वह ठगा गया है फिर भी वह दोतीन रोज और ठहरकर
रोज वहां आता और लोगों से पूछताछ करता लेकिन कोई फायदा नही हुआ. संयोग से एक
दिन वह ठग फिर संचेती होटल के पास दिखाई दे गया. जायरीन ने उसे पकडा और बुरा
भला कहा तो ठग बोला कि उस रोज मैं फीता लेकर आया तब तक आप जा चुके थे. मैं
तो अब भी घंटाघर नापकर देने को तैयार हूं परन्तु आज भी मेरें पास फीता नही हैं. इस
पर जायरीन ने कहा कि ऐम करो तमे यांति ठहरो अणे हूं फीतो लेर आउंछू. ठग उसकी
बात मान गया. कहते है कि उसके बाद दोनों की मुलाकात आजतक नही हुई, उधर घंटाघर
भी उनका इंतजार कर रहा हैं.
एक बार उर्स के मौकें पर कुछ निजि प्रयास से प्रदर्षनी का आयोजन किया गयाआय
ोजकों ने सस्ती दरों पर खाने-पीने के पंडाल एवं दर्षकों को निःषुल्क प्रवेष देने की षर्त
पर नगर परि द से नाममात्र के षुल्क पर पटेल मैदान लेलिया. बाद में उन्होंने ‘मैनेज’
करके प्रर्दषनी में प्रवेष षुल्क लगा दिया. अगली साल जब उन्होंने फिर प्रदर्षनी लगााने हेतु
आवेदन किया तो परि द ने एतराज किया और कहा कि आपको लिखकर देना होगाा कि
प्रवेष मुफत होगा. खैर आयोजकों ने लिखकर दे दिया और प्रदर्षनी चालू होगई. समय रखा
गया दोपहर 3 बजे से रात्रि 11 बजे तकलेकिन परि द अधिकारियों का आष्चर्य का ठिकाना
नही रहा जब उन्होंने देखा कि आयोजकों ने इस बार प्रवेष षुल्क की बजाय बाहर निकलने
का टिकट रखा हैं. अब दर्षकों के सामने दो ही विकल्प रहते थे, यातो रात्रि 11 बजे तक
अंदर ही रहकर कुछ खाया-पीया जाय या टिकट खरीदकर बाहर आया जाय. हां अलबत्ता
उन्होंने इतनी मेहरबानी जरूरकी कि जो कोई खरीदकर कुछ खा-पी लेगा उसे बिल दिखाने
पर ऐक्जिट टिकट नही खरीदना पडेगापाकिस्तान
लौटकर जानेवालें लोग अकसर अपने देष में ही षिकायत करते मिल
जायेंगे कि औरों की तो क्या कहें हमारें अपने आदमी हमसे अच्छा सलूक नही करते. अब
आप देखें जब वापसी में हम दिल्ली हवाई अडडें पर पाकिस्तानी एयरलाइन्स के काउंटर पर
पहुंचे तो वहां लिखा था ‘पीआइये’. जब हम पी आएं तो उहोंने हमें बोर्डिंग पास देने में
आनाकानी की. अब किससे गिला षिकवा करें और किससे नही करें ?
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

एक फोटो फ्रेम के मुख से

कमरे के कौने में ,
मेज पर पड़े चांदी के
रत्न जडित फोटो फ्रेम
पर दृष्टी पडी
जिसमें मेरे पर दादा की
तस्वीर लगी हुयी थी
मुझे से रहा ना गया
उसे हाथ मैं उठा कर
देखने लगा
ऐसा प्रतीत हुआ मानों
कह रहा हो
मैं सामान्य फोटो फ्रेम
नहीं हूँ
कई दशकों से इस कमरे में
होने वाले
हर कार्य कलाप का गवाह हूँ
चंचल बचपन ,
जोश से भरी
जवानी और थके हुए
झुर्रियां लिए बूढ़े चेहरों की
तसवीरें मैंने ह्रदय से
लगा कर रखी हैं
जो संसार से चले गए
उन्हें भी प्रेम से संजोया है
मेरा स्थान बदलता रहा ,
पर कमरा नहीं बदला
मैंने खामोशी से घर के
लोगों को
बचपन से बुढापे तक
संसार में आते जाते देखा
घर में किसी ने जन्म लिया
या फिर कोई सदा के लिए
चला गया
मुझे भी भरपूर खुशी और
दुःख हुआ
घर के लोगों को हँसते ,
रोते देखा
लड़ते झगड़ते देखा
प्यार मोहब्बत में जीते देखा
जीवन के हर रंग को
समीप से देखा
पता नहीं कब तक देखना है
जब तक
घर में सम्पन्नता है
मुझे पूरी आशा है
कोई मुझे कुछ रूपये
के लिए
अपने से दूर नहीं करेगा
मैं हँस बोल
नहीं सकता तो क्या ?
इस घर को अपना
मानता हूँ
सदा घर की समृद्धी के लिए
परमात्मा से निरंतर प्रार्थना
करता हूँ
किसी और जगह जा कर
मुझे खुशी नहीं मिलेगी
उसकी ह्रदय से
निकली प्यार भरी
बातों ने
मुझे भाव विहल कर दिया
फोटो फ्रेम को मैंने
सीने से लगा दिया


तेरी शादी किसी गधे से कर दूंगा (हास्य कविता)

हँसमुखजी ने
बड़े शौक से गधा पाला
थोड़े दिनों तक तो बहुत
प्यार से रखा
फिर धीरे धीरे उससे
मोह कम हो गया
निरंतर उसे मारने
पीटने लगे
खाने को भी कम देते ,
घर से बाहर निकाल देते
गधा भी ढीठ था
प्रताड़ित होता रहता
भूखा रहता
पर जाने का नाम
ना लेता
पड़ोसी के घोड़े से
देखा ना गया
एक दिन
उसने गधे से कहा
क्यों निरंतर मार खाते हो ?
यहाँ से कहीं चले क्यों
नहीं जाते ?
गधा बोला मन तो
मेरा भी करता है
यहाँ से चला जाऊं
पर हँसमुखजी दिल के
बहुत अच्छे इंसान हैं
क्रोध तो
अपनी लडकी पर भी
करते हैं
उसे कहते हैं
तेरी शादी किसी गधे से
कर दूंगा
बस किसी दिन ज्यादा
भड़क जाएँ
क्रोध में मुझ से
अपनी लडकी की शादी
करवा दें
इसी इंतज़ार में
जाते जाते रुक जाता हूँ


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मेरा जूता एक दिन बोला मुझ से
मेरा जूता
एक दिन बोला मुझ से
कब तक घिसोगे मुझको
मेरी प्रार्थना सुन लो
मेरे कष्ट थोड़े कम कर दो
सहने के लिए एक
साथी दे दो
जूते की एक और जोड़ी
खरीद लो
चलते चलते थक गया हूँ
कीचड,गोबर में
सनते,सनते उकता गया हूँ
धूल,मिट्टी से भरता हूँ
उफ़ करे बिना
पथरीले सफ़र पर
चलता हूँ
सर्दी,गर्मी,बरसात में
निरंतर मुझे घसीटते हो
कभी क्रोध दिखाने के लिए
नेताओं पर उछालते हो
कोई झगडा करे तो
निकाल कर मारते हो
मुझे खुश करने के लिए
थोड़ी सी पोलिश
लगाते हो
बदबूदार मोज़े सूंघते
सूंघते
आत्म ह्त्या का मन
करता
मेरी छाती जैसा तला
गम में फट ना जाए
उससे पहले थोड़ा सा
रहम कर दो
जूते की एक और जोड़ी
खरीद लो
सहने के लिए एक
साथी दे दो



नेता सफ़ेद कपडे ही क्यों पहनते (हास्य कविता)
हँसमुखजी
बहुत परेशान थे
समझ नहीं पा रहे थे
उनके देश में नेता सफ़ेद
कपडे ही क्यों पहनते
अपनी परेशानी का ज़िक्र
अपने नेता मित्र से किया
नेता मित्र ने
हँसते हुए जवाब दिया
बड़े भोले हो
इतना भी नहीं समझते
कॉमन सैंस काम में लो
कारण जान लो
हमारे दिल काले,धंधे काले
कारनामे काले,इरादे काले
ज़िन्दगी में
कोई और रंग भी होना
चाहिए
इसलिए कपडे सफ़ेद पहनते
अपने कालेपन को
निरंतर सफ़ेद कपड़ों से
छुपाने की कोशिश
करते



सिर्फ गधे क्यों रेंक रहे हैं
पशु मेले का उदघाटन
करने नेताजी पधारे
उनके आते ही सारे गधे
ढेंचू ढेंचू करने लगे
नेताजी चकरा गए
चमचे से पूछने लगे
बाकी जानवर चुप हैं
सिर्फ गधे क्यों रेंक
रहे हैं
चमचे ने अपने ज्ञान का
परिचय दिया
खुशी खुशी बताने लगा
हुज़ूर गधे
बिरादरी का रिवाज़
निभा रहे हैं
कोई भी जाति भाई
दिखता है
तो स्वागत में निरंतर
रेंक कर अपनत्व का
परिचय देते हैं
खुशी में रेंकते हैं

हँसमुखजी ने प्रेमपत्र लिखा (हास्य कविता)
हँसमुखजी का
हाथ हिंदी में तंग था
फिर भी प्रेमिका को
हिंदी में प्रेम पत्र लिख दिया
तुम मेरी दिल लगी हो
स्वर्गवासी अप्सरा सी
लगती हो
तुम्हारे लिए चाँद तारे
तोड़ कर ला सकता हूँ
कोई नज़रें उठा कर
तुमको देखे ले तो
यमराज की तरह
जान भी ले सकता हूँ
प्रेमिका ने भी प्रेमपत्र का
जवाब प्रेम से दिया
ओ मेरे दिल के चौकीदार
मुझे पाना है तो
तुम्हें भी स्वर्गवासी होना
पडेगा
चाँद तारों को तोड़ने से
पहले
उन्हें छोटा कर पेड़ पर
लटकाना होगा
किसी की जान लेने से पहले
यमराज सा दिखना होगा
विवाह के लिए
भैंसे पर बैठ कर आना
पडेगा
अगला प्रेम पत्र लिखो
उसके पहले हिंदी को
सुधारना होगा


हँसमुखजी का निशाना (हास्य कविता)
हँसमुखजी पोते के साथ
क्रिकेट खेल रहे थे
गेंदबाजी कर रहे थे
गेंद कभी विकेट के
तीन फीट दायें
कभी तीन फीट बायें से
निकल रही थी
पोता परेशान हो गया
कहने लगा
दादाजी आप झूठ
बोलते हैं
एक भी गेंद विकेट पर
सीधे ड़ाल नहीं सकते
लेकिन डींग हांकते हो
आपने जवानी में कई शेर
सटीक निशाने से मारे
हँसमुखजी बोले
तुम आधा गलत
आधा ठीक कहते हो
शेर तो मैंने ही मारे
पर निशाना तब भी
ऐसा ही था
डर नहीं लगे इसलिए
शिकार पर जाने से पहले
जम कर शराब पीता था
नशे में
शेर होता कहीं और था
दिखता कहीं और था
दिखता तीन फीट बायें
होता तीन फीट दायें
शेर को निशाना लगाता
गोली सीधी शेर को
जाकर लगती
तीन फीट का हिसाब
अभी भी चल रहा है
पीना छोड़ दिया है
इसलिए
लाख कोशिशों के बाद भी
गेंद विकेट पर नहीं
लगती

डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181