बुधवार, 16 नवंबर 2011

क्या करोगे करोगे तुमु मेरी तस्वीर लेकर ?

वो क्या है कि सन साठ के दषक में बनी एक फिल्म में फोटों को लेकर
नायक-नायिका के बीच कव्वाली के माध्यम से मीठी मीठी तकरार चलती है जिसके बोल है
‘क्या करोगेगे तुमुम मेरेरी तस्वीर लेकेकर’ बहुत देर तक तकरार होती हेैं, गिलें षिकवें होते हेैंतब
भी बात नही बनती. उस समय कव्वाली को लेकर मेरें मन में कई बार अपनी फोटों
ख्ंिाचवाने की तलब हुई कि अगर मुझसे ‘कोई’ इस तरह फोटों मांगें तो मैं तो तत्काल देदूं
लेकिन उस वक्त किसी ने मांगी ही नही. बात मन की मन में रह गईपहले
पहल मैंने अपनी फोटों तब खिंचवाई थी जब मुझे हाई स्कूल की परीक्षा का
फार्म भरना था. मैं सजधजकर हुलसा हुलसा पुरानी मंडी में सडक किनारें स्थित कैलाष
फोटों स्टूडियों गया. दुकानदार ने मुझे कैमरें के सामने रखें स्टूल पर बैठाकर दो चार बार
मेरी गरदन दांये, बांये, उपर नीचे की और फिर मेरी फोटों खैंचदी. वही मैंने परीक्षा फार्म
पर चिपकादी.
परीक्षा के समय जब मैं दूसरी स्कूल स्थित परीक्षाकेन्द्र पर गया तो कुछ देर बाद
वही फोटों लगा फार्म लेकर एक परीक्षक वहां आया और बार बार कभी मुझे और कभी
परीक्षाफार्म को देखते हुए बोला कि क्या आपही .......गोयल है ? मेरें द्वारा हामी भरे जाने
पर वह बोला कि आपकी षक्ल फोटों से 100 परसेंट नही मिलरही हैं. इस पर मैंने जवाब
दिया कि कोई बात नही, जितनी मिल रही हेै उतनी मिलादें. अगर 33 परसेंट भी मिल
जायगी तो भी ‘पास’ तो हो ही जाउंगा न ? वैसेभी उससे ज्यादा नम्बर तो मेरें किसी
सब्जेक्टमें आज तक कभी आए ही नही. माध्यमिक षिक्षा बोर्डभी तैतीस परसेंटवालों को
पास करता ही हैं.यह सुनकर वह मुझे ऐसे घूरनेलगा जैसे पुलीसवाला अपराधी को घूरता हैंहाईस्कूल
और फिर डिप्लोमा करने के बाद कुछ दिन यूंही घूमता रहा तो बेकारी में
सबसे सरल रास्ता नेतागिरी लगा. मैं सफेद कुर्ता पायजामा पहनने लगा और जोडतोड
लगाकर एक राजनीतिक दल की हमारी गली की षाखा-कृपया कोई इसे आरएसएस की
षाखा ना समझलें वर्ना दिगविजयसिंहजी पीछे पडने में देर नही करेंगे-का अध्यक्ष बन गयासदा
की भांती उस साल भी वर्षा ऋतु में वृक्षारोपण का बडा हल्ला मचा. वन विभाग के
आंकडें तो खैर लाखों-करोडों को पार कर गए लेकिन हमारा उद्धेष्य सीमित था. हम लोग
तो हाथाजोडी करके पंचकुंड स्थित नर्सरी से कुछ पौधें ले आए और ले देकर स्थानीय
अखबारों में वृक्षारोपण महोत्सव का खूब प्रचार करवाया. नतीजतन कुछ लोग गली के
इकटठे होगए, कुछ राह चलते लोग और कुछ स्कूल जाते बच्चें वहां रूक गए. हमने एक दो
प्रेसफोटोग्राफर एवं पत्रकारों से भी अनुनय-विनय की तो वह भी आगए. उसी समय मैंने
देखा कि घटनास्थल से कुछ दूरी पर गाएं, बकरियां भी खडी थी जो ललचाई नजरों से
लगनेवालें पौधों को देख रही थीपहले
मैंने लिखित भाषण दिया. अधिकांष में तो मैं वही बोला जो मुझे लिखकर
दिया था लेकिन जहां मैंने अपनी तरफ से कुछ मिलाया वही हो हल्ला होगया जोकि लिखित
भाषणवालों के साथ होता आया हैं. यूपी इत्यादि जगहों में आजभी हो रहा हैं. आप आए
दिन अखबारों में पढ ही रहे होंगे. खैर, भाषण समाप्त होने व तालियां बजने के बाद मैंने
एक पौधा लगाया. हालांकि इस काम में मेरे सफेदझक कपडों पर कुछ मिटटी लग गई
जिसका मुझे बहुत अफसोस रहा लेकिन इससे भी ज्यादा मलाल इस बात का रहा कि
ऐनवक्त पर फोटोग्राफर के कैमरे का क्लिक नही होपाया और मेरी फोटों नही छपीउन्हीं
दिनों एक बार पुष्कर मेले में जाने का मौका मिला. वहां दडें पर एक चलते
फिरते स्टूडियोंवाले ने हाथोंहाथ फोटों खैंचने की दुकान लगा रखी थी. उसके पास एक पर्दा
भी था जिसमे एक हवाईजहाज का चित्र लगा हुआ था तथा उसमें बैठने का स्थान कटा
हुआ था ताकि जिसे हवाईजहाज में बैठे हुए फोटों खिंचवानी हो वह पर्दें के पीछे बैठकर
फोटों खिंचवायें तो उसकी फोटों हवाईजहाज में बैठे हुए दिखलाई देगी. मैंने भी इस पोज में
अपनी फोटों खिंचवाई और कइयों को दिखलाई कि ‘किंग फिषर एयरलाईन’ में बैठा हूं
लेकिन लगा कि किसी पर भी प्रभाव नही पडाकुछ
समय बाद जब नौकरी हेतु अर्जी दी तो फार्म के साथ साथ अपनी फोटों भी
भेजी. वहां से यह लिखा हुआ आया कि आप फोटों में अपनी उम्र से दस वर्ष बडे लग रहे
हैं. कही आप ‘ऐजबार’ यानि अधिक उम्र तो नही हैे ? मैंने उनको उत्तर भेजा कि वैसे तो
मेरी उम्र अधिक नही है लेकिन वह फोटों दस वर्ष बाद की लगती है तो इसे सुरक्षित रखलें
क्या पता आपको दस वर्ष बाद अखबारों इत्यादि में देने हेतु मेरी फोटों की जरूरत पड
जाय तब आपको दुबारा मेरी फोटों नही ढंूढनी पडेगीनौकरी
लगते ही रिष्तेदारों तथा षादी करवानेवालें आसपास मंडराने लगे. उनको यह
गंवारा नही कि कोई कुंवारा- कुंवारा ही क्या कुंवारी भी- दो दिन सुख चैन से रहलें. खैर,
दुबला पतला तो था लेकिन फिर भी एक जगह रिष्ता तय होगया. एक रोज सालीजी का
पोस्टकार्ड आयाकि आपकी फोटों भिजवायें. उन दिनों मोबाइल वगैरह तो क्या घरपर भी
फोन की सुविधा नही थी. मैंने अपनी फोटों भिजवाई तो तुरन्तही सालीजी का जवाब आगया
कि हमने आपसे फोटों मांगी थी लेकिन आपने भूलसे अपनी एक्सरे भिजवादी लगती हैं. मैंने
जब अपनी सहेलियों को वह दिखाई तो वे सब हंस पडी और खूब मजाक बनाया. मुझे
काफी षर्मिन्दा होना पडा. जीजाजी ! प्लीज अपनी एक्सरे नही, फोटों भेजिये और इस
चिटठी को ‘तार’ समझियें-मेरा मानना है कि आजकी इस पीढी के अधिकांष लोगों को इस
‘तार’ षब्द का मतलब षायद ही पता होकुछ
वर्षों बाद किसी के उकसावें में आकर हास्य-व्यंग्य संग्रह की एक किताब
छपवाली. जब उसका विमोचन हो रहा था तो वहां एकत्रित हुई भीड में से किसी ने एक
नोटबुक मेरे आगे करदी. यहां मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं हिन्दी-इंगलिष में दिल्ली
से प्रकाषित ‘षंकर्स वीकली का वर्षों पाठक रहा और मुझें उस पत्रिका का प्रतीक चिन्ह, जो
कि एक गधा था, बहुत अच्छा लगता था. हास्य-व्यंग्य का माहौल देखकर मैंने उस व्यक्ति
की नोटबुक पर गधे का स्कैच खैंच दिया तो प्रषंसा करने की बजाय वह बोला सरजी ! मैंने
फोटोग्राफ नही ऑटोग्राफ मांगा था. अब आपही बतायें मैं उसे क्या कहता ?
एक बार एक निकट के रिष्तें की षादी में जाना हुआ. वहां एक मौकें पर बार बार
मेरी फोटों खैंची जाने के लिए बहुत आग्रह किया जाने लगा तो मैंने भी हर बार इठलाकर
कहा कि नही नही क्या करोगे मेरी फाटों खैंचकर ? तो पीछे से किसी ने आवाज लगाई
‘बच्चों को डरायेंगे’.
अब भी जब कोई मुझसे फोटों की मांग करता है तो सोचता हूं कि मैं उसे अपनी
फोटों भिजवातो दूं लेकिन क्या करूं आजकल बच्चें-बडें जो फोटुएं खैंचते है उन कैमरों में
रील नही होती, तो बिना रील की फोटों कैसी आयेगी और केैसे मैं किसी को भेजूंगा ? लेने
वालें भी ऐसी फोटों का क्या करेंगे ? इसीलिए मेरा कहना यही है कि ‘क्या करोगेगे तुमुम मेरेरी
तस्वीर लेकेकर’.
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

सोमवार, 14 नवंबर 2011

बाल दिवस कैसे मनाता ?

जाने क्या सोचकर 14 नवम्बर से कुछ पहले हमारी कॉलोनी के बच्चें मेरे पास आए
ओैर कहा कि अंकल इस बार हम बाल दिवस मनाना चाहते हेैं. मैंने उन्हें कहा कि मनाओ,
खूब मनाओ, किसने मना किया हेै ? आजकल तो मुक्त व्यापार व्यवस्था में हर रोज ही
कोई न कोई दिवस मन ही रहा हैं. फिर बाल दिवस तो हमारे देष में वैसे भी एक
महत्वपूर्ण दिवस है. इस पर वह बोले कि नही अंकल हम जो बाल दिवस मनाना चाहते है
उसमें आपको मुख्य अतिथि बनाना चाहते हैं.
यह सुनकर मैं चौंका. मुझे आज तक किसी ने मुख्य अतिथि तो क्या साधारण
अतिथि के लायक भी नही समझा. मैं स्वयं अपनेआप ही किसी समारोह में चला गया होउॅ
तो और बात हेैं. वहां गया, कुछ देर पीछे की कोई खाली सीट देखकर बैठ गया और जब
उपदेषात्मक भाषण से जी उकता गया तो उठकर चल दिया. खैर, मैंने उन्हें कहा कि आप
लोग मुझे बाल दिवस का मुख्य अतिथि बनाना चाहते है परन्तु मेरे सिर पर बाल तो है ही
नही फिर मैं बाल दिवस का मुख्य अतिथि बनकर क्या करूंगा ? इस पर बच्चें हंसने लगे
औेर एक साथ बोल पडे अंकल यह बाल दिवस सिर के बालोंवाला नही चाचा नेहरू के
जंमदिवसवाला बालदिवस हैं. तब कही जाकर मेरे को बात समझ में आईपहले
जब कोई परीचित कुछ अर्सें बाद मिलता तो पूछता था कि ‘बाल बच्चों के
क्या हाल है ?’ लेकिन अब उम्र के इस पडाव पर ऐसा मौका आने पर पूछता है ‘बच्चें
क्या कर रहे है ?’ यानि हालचाल पूछने में ‘बालों’ की कोई बात ही नही करताआपतो
जानते ही है कि सिर के बालों का सीधा संबंध नाई से भी हैं. पहले मैं बाल
कटवाने हर माह नाई की दुकान जाता था. लेकिन जबसे अमिताभ बच्चन का ‘कौन बनेगा
करोडपति’ ऐपिसोड चला हेै तब से ही नाइयों ने भी धूम मचा दी हैं. वे लोग ऐपीसोड की
तर्ज पर बाल काटने की दरें पहले दुगनी फिर चौगुनीवाली रफतार से बढाते जा रहे हेैं मानो
कांग्रेस और मनमोहनसिंहजी से पुरानी दुष्मनी निकाल रहे हो. जब ऐसा हुआ तो मैंने
उनकी दुकान पर जाने की ‘फ्रिक्वेन्सी’ कम करदी. मैंने सोचा कि मनमोहनसिंहजी अथवा
मॉन्टेकसिंहजी तो आक्सफोर्ड तथा हार्वर्ड यूनिवरसिटी की अपनी पढाई और विष्वबैंक के
अपने कार्यकाल के अनुभव से महंगाई कम करेंगे तब करेंगे क्योंन इसे कम करने की यह
तरकीब आजमाई जाय ? चाहे तो आपभी आजमाकर देखलें, बडे काम का नुस्खा हैंमहंगाई
का कारगर ढंगसे सामना करने का जो एक और गुर मेरे एक मित्र ने मुझे
बताया है वहभी लगे हाथ आपको बता देता हूं. उनके पास एक स्कूटर है. एक बार मैंने
उनसे पेट्ोल-डीजल के बढते दामों की चर्चा की तो बोले मैं तो जबभी पेट्ोलपम्प जाता हूं
तो सेल्समेन से कहता हूं कि सौ रू. का पेट्ोल डालदो. ऐसा पिछले कई सालों से कर रहा
हूं. मैंने तो आज तक एक नया पैसा ज्यादा नही दिया. कौन कहता है कि पेट्ोल महंगा हो
गया ? आपभी चाहे तो आजमा सकते हैंमैं
जिस सैलून पर बाल कटवाने जाता हूं वह नाई मेरे कुर्सी पर बैठते ही ‘मनोहर
कहानियां’ या ‘सत्य कथाओं’ में से कोई सनसनीखेज किस्सा ढंूढकर मुझे सुनाने लगता हैं
अथवा टीवी की विषेष चैनल चला देता है जिसमें छोटी छोटी बातों की भी सनसनी फैलाई
जाती है तथा बादमें बाल काटता हैं. एक बार जिज्ञासावष मैंने उससे पूछा कि वह ऐसा क्यों
करता है ? तो उसने जवाब दिया कि ‘अंकल ! आपके बाल बहुत कम और छोटें है, ऐसे
किस्सें सुनाने से बाल खडे होजाते है जिससे उन्हें काटने में सहुलियत होती है’ मैं इस
रहस्योदघाटन से आष्चर्यचकित रह गयाहालांकि
इससे पहले एक दो बार मैंने नाई से कहाभी कि मेरे तो बाल कम है अतः
कम रेट लगनी चाहिए तो उल्टे वह बोलाकि अंकल मैं तो लिहाज के मारे बोलता नही हूं
वर्ना आपके तो और भी ज्यादा पैसें लगने चाहिए क्योंकि एक एक बाल को ढूंढ ढूंढकर
काटना पडता है. जब मैंने उसकी यह दलील सुनी तो रेट के बारे में उसे कहना ही छोड
दिया क्या पता उसे फिर याद आजाय और वह दाम बढादे तो मेरी महंगाई का सूचकांक तो
उपर चला जायगा न, फिर कौनसा सरकार उसी हिसाब से मेरी पेंषन बढा देगी ? भुगतना
तो मुझे ही पडेगाइसलिए
मैंने तो कॉलोनी के बच्चों को मना कर दिया कि मैं बाल दिवस का मुख्य
अतिथि बनने लायक नही हूं. मेरे को बख्ष दे और किसी नेता को पकडेई.
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

शनिवार, 12 नवंबर 2011

बडी कचहरी - छोटी कचहरी

ईष्वर ने जबसे सृष्टि की रचना की न्याय तभी से किसी न किसी रूप में मौजूद
रहा हेैं. तुलसीदासजी ने मानस की रचना तो कलियुग में की लेकिन कथा त्रेतायुग की कहीउसमें
उन्होंने न्याय के लिए यही कहा ‘समरथ को नही दोष्ेष गुसुसांइंईर्’ . फिर ‘जिसकी लाठी
उसकी भैंस’ का जमाना आया और काजीजी न्याय करने लगे. उस काल में काजी इतने
मषहूर होगए कि उनके नाम के मुहावरें बनने लगे. मसलन ‘काजीजी दुबुबले क्यों ं ? षहर के
अंदंदेष्ेषे से’े’ या ‘मियां बीबी राजी तो क्या करेगेगा काजी ? इत्यादि फिर राजाओं का जमाना
आयाकुछ
का कहना है कि वें बडे न्यायप्रिय थे. रजवाडों के समय में न्याय कैसे होता था
इसकी एक छोटीसी मिषाल पेष है. राजस्थान की एक बडी रियासत की हुबहू घटना हैं. एक
समय उस राज्य में ‘दरबार’ के फैसले हेतु काफी फाइलंें इकटठी होने लगी. हालांकि दरबारी
एवं कारिन्दें उन्हें बार बार याद दिलाते रहते थे, ‘बडा हुकुम ! घणी खम्मा ! घणी सारी
फाइलां को ढेर लाग रयोै है जो गरीब परवर से न्याय मांग रही हेै, हुजूर की करौ’ लेकिन
महाराजा साहब को इन कामों के लिए फुर्सत कहां थी. वह कह देते
अरे बाला ! अबार रैबादेै, जद चौको दिन होसी कर देवा फैसलो, कित्तोक तो टैम
लागसी ?-अर्थात जब अच्छा दिन होगा तब फैसला कर देंगे.-
परन्तु धीरे धीरे जब फाइलों का अंबार लग गया तो एक रोज मुंह लगा एक दरबारी
हाथाजोडी करके उन्हें न्यायकक्ष में लेगया. वहां एक बडी मेज पर फाइलों का ढेर रखा हुआ
था. जब महाराजा सिंहासन पर विराज गए तो उन्होंने एक दरबारी से कहा कि ‘आलै म्हारी
छडी और इै ढेर पर मार.’ उस कारिन्दें ने उनके हुकम का पालन किया. इसका नतीजा
यह हुआ कि कुछ फाइलें मेज के दाहिनी ओर गिर गई और कुछ बांयी ओर, इसके बावजूद
कुछ अभागी फाइलें मेज पर ही पडी रह गई.
...अब काई करणों है हुजूर ! कारिन्दें ने पूछने की हिम्मत की.
...करणो कांई है रे, जो अठीनै-दाहिनी तरफ-पडी है बै सगलां जीत गया औेर जो
बठीनै-बांयी तरफ-पडी है बै बापडा-अभागा-सगलां हार गया.-दाहिनी तरफवालें जीत गए
और बांयी तरफवालें हार गए-
...हुजूर ! अै कुछ फाइलां तो अठैही-मेज पर ही- रहगी, ब्याकौ कांई करणो है ?
-जो कुछ फाइलें मेज परही रह गई उनका क्या करना है-
... अरे गेला ! तू गेलो ही रयौ, तू कोनी सुधरै. यांको यान करणो है कि सबानै
साल दो साल की तारीख दे दै. न्याय कोई यांन ही कोनी मिलै, कोई हथेली म्है तो सरसों
उगै कोनी, इमै भी टैम लागेै. समझयो या कोनी समझयो ?-यानि बाकी लोगों को अगली
तारीख देदे. इतना कह कर महाराजा यह कहते हुए चल दिए कि ‘म्हानै अब और टैम
कोनी. और घणो ही काम करबा को है, ओ एकलो काम ही थोडी हेैं.’
बाद में उनकी प्रजा ने जब यह बातें सुनी तो उनमें से जीतनेवालों के उदगार थे कि
वाह ! महाराजा, घणीखम्मा, अन्नदाता कांई न्याय करयौ है, दूध को दूध और पाणी को
पाणी कर दियो जाण हंसो करै है, जदी तो अै राजा सूर्यवंषी-चन्द्रवंषी कहलावै हैें. धन्य
म्हाका भाग जो इस्यां राज म्है पैदा हुया. कलयुग म्है भी सुरग की जाण लागै हैंअंग्रेजों
के समय से ही इस षहर में दो कचहरियां थी. और दूसरी जगह की तरह
मसलन पुरानी दिल्ली की फतेहपुरी स्थित ‘भवानीषंकंकर की कचहरी,’ की तरह उनका
नामकरण नही था. आपको तो पता ही होगा कि भवानीषंकर जसवंतराव होल्कर का वजीर
था जो बाद में अंग्रेजों से मिल गया था. इसी कारण उसकी इतनी प्रसिद्धी है कि कूंचा
घासीराम स्थित उसकी हवेली आज भी ‘नमक हराम की हवेलेली’ के नामसे जानी जाती हैदेख्
ाा आपने, क्या नाम है ? खैर, इस षहर में स्थित यह कचहरियां तो एक छोटी और
दूसरी बडी कचहरी कहलाती हैं. कहते है कि कचहरियां कानून के अनुसार चलती हैं परन्तु
लोगों का कहना है कि यह दोनों कचहरियां तो आज भी वही की वही है जहां सौ साल
पहले थी. यहां वकील अब भी काला कोट पहनकर आते हैं. कहते है कि सन 1694 ईमें
इंगलेंड में क्वीन मेरी का देहांत होगया तब उनके षोक में जिन देषों में अंग्रेजों का राज्य
था वहां की अदालतों में काले कपडें पहनकर आना षुरू हुआ था जो परम्परा के वषाीभूत
होकर आज तक चालू हेैं. भला बताइये कि ऐसी परम्पराएं नही निभाएंगे तो हम दुनियां को
कैसे बतायेंगे कि कभी अंग्रेज हम पर राज्य करते थेदोनों
ही कचहरियों में बडे दिलचस्प मुकदमें आते रहते हैंे. बहुत वर्षों पूर्व की बात
है. बडी कचहरी में एक मुकदमा दाखिल हुआ. उसके अनुसार रामू नामक एक व्यक्ति यात्रा
पर गया. जाने से पहले उसने अपने मित्र ष्यामू को कहा कि मेरे पास 500 रू. है वह
तुम रखलो जब मैं वापस आउॅगा तो लेलूंगा. यह कहकर वह कुछ दिनों के लिए यात्रा पर
चला गया. जब डेढ-दो महीनें बाद वापस लौटा तो उसने ष्यामू से अपने रू. वापस मांगे
लेकिन ष्यामू मुकर गया और रामू से कहा कि कौनसे रू.? मामला अदालत में पहुंचा. जज
ने रामू से कहा कि तुमने रामू को जब रू. दिए थे तब क्या कोई अन्य व्यक्ति भी वहां था
? रामू सीधासादा था बोला हुजूर मैंने रू. एक पेड के नीचे दिए थे, उस समय वहां हम
दोनों के अलावा और कोई नही था. इस पर जज महोदय ने एक योजना बनाई ओैर उसी
अनुसार रामू से कहा कि जाओ और उस पेड से पूछकर आओ कि क्या वह इस केस में
गवाही देगा ? रामू चला गया. जब काफी देर बाद भी वह नही लौटा तो जज ने अदालत
में कहा कि क्या बात हुई रामू अभीतक नही लौटा तो ष्यामूने कहा कि वह अभी से ही
कैसे लौट आयेगा, वहतो अभी वहां तक पहुंचा भी नही होगा. इस बात पर जज ने उसको
पकड लिया और कहा कि तुम्हें कैसे मालूम कि वह पेड यहां से बहुत दूर है ? तुम सच
सच बताओ नही तो मैं तुम्हें कडी से कडी सजा दूंगा इस पर ष्यामू घबडा गया और सच
सच बता दिया. इस तरह पेड की गवाही की युक्ति काम आगई और रामू को उसकी रकम
मिल गई.
षायद इसी से प्रेरणा लेकर यहां के नगर निगम ने अपने मुख्य द्वार के पास स्थित
पेड पर एक बोर्ड लगाया हुआ है जिस पर लिखा है ‘मृतक जानवरों ं की सूचूचना यहां देवेवें’ं’
जबकि हकीकत में अकसर वहां पेड के अलावा और कोई होता ही नही हैं. निगम का
आषय यह रहा होगा कि जब पेड कचहरी में गवाही दे सकता है तो निगम की रिपोर्ट क्यों
नही दर्ज कर सकता हैं ? अवष्य कर सकता हैं और वह भी बिना पगार बढाने की मांग
किए और बिना धरना, प्रदर्षन अथवा हडताल की धमकी दिए.
इसी कचहरी में एक बार बडा दिलचस्प केस आया. वाद के अनुसार एक षाम चार
व्यक्ति दौलतबाग में जूआ खेल रहे थे. एक पुलीसवालें की नजर उनपर पड गई. उसने
उनको रंगे हाथों पकड लिया. उन पर केस दायर हुआ. काफी समय तक मुकदमा चला
और गवाह इत्यादि के बयानों के बाद अभियुक्तों की पेषी हुई. मजिस्ट्ेट ने पहले अभियुक्त
से पूछा:-
...तुम फंला तारीख को बाग में जूआ खेल रहे थे ?
...हुजूर ! पुलीस का यह आरोप गलत हैं. उस तारीख को तो मैं धार्मिक यात्रा पर
रामेष्वरम गया हुआ था. इसका प्रमाण है ‘चारधाम सप्तमपुरुरी यात्रा’ हेतु प्रसिद्ध यात्रा
कम्पनी की यह एलटीसी की रसीद. मैं धर्म-कर्म को माननेवाला व्यक्ति हूं. मुझे इनसे क्या
लेना देना ?
मजिस्ट्ेट महोदय ने उसकी दलीलों से सहमत होते हुए उसे बरी कर दियाअब
दूसरें अभियुक्त की बारी आई. उसने कहा:-
...मैं तो एक लम्बे अर्से से बीमार हूं और इसका प्रमाण है षहर के मषहूर आरएमपी,
‘खानदानी हकीम’ साहब का सार्टिफिकेटमजिस्ट्
ेट महोदय ने कुछ सोचकर उसे भी बरी कर दिया. अब तीसरें का नम्बर आयाउसने
कठघरे में खडे होकर बयान दिया:-
...सा’ब ! मैं एक जिम्मेवार सरकारी कर्मचारी हूं. हाजिरी करने के बाद हमें सुबह से लेकर
रात तक ऑफिस में मौजूद रहना पडता हैं. मैं उस रोज वहां मौजूद था और इसके सबूत
के रूप में यह रहा मेरे बॉस गजेटेड ऑफीसर का उपस्थिति प्रमाण पत्र.
मजिस्ट्ेट साहब के पास इसे भी छोडने के अलावा क्या चारा था ? जब तीनों अभियुक्त
बरी हो गए तो चौथे की बारी आई. उसने अपनी बात रखते हुए मजिस्ट्ेट साहब से कहा
...हुजूर ! जब यह तीनों ही वहां नही थे तो मैं अकेला किसके साथ जूआ खेलता ?
अंततः मजिस्ट्ेट साहब ने उसको भी बरी कर दिया.
षायद इसी से प्रेरणा लेकर देष के कुछ राजनीतिज्ञ ‘नोटेट के बदले वोटेट’ का खेल
खेल गए. अब दोनों ही मुख्य राजनीतिक दलों एवं तथाकथित समाजवादी दल के नेता,
सभी, एक एक करके मना कर रहे है कि ‘खेल’ में हम थे ही नही अर्थात ‘नो वन किल्ड
जेेिसिकालाल’ अब आखिरी बंदा भी इंकार कर देगा कि मैं अकेला किससे नोट लेता ओैर
किसको नोट देता ? इसको कहते है ‘चातुरुरी’ परन्तु इन्होंने षायद यह कहावत नही सुनी है
‘घणी चतुरुराईर्,, खुदुद नै ही खाईर्’’
कचहरी में एक बार ऐडीषनल जज के इजलास में एक केस आया. हुआ यह कि
वरमाजी और षरमाजी के सरकारी बंगलें पास पास ही थे. वरमाजी मलाईदार विभाग में थे
जबकि षरमाजी के यहां छाछ की भी तंगी थी. वरमाजी ने अलग अलग विदेषी नस्ल के दो
कुत्तें पाल रखे थे. वह बडा षोर मचाते थे. षरमाजी को यह सब बडा अखरता थाआपसकी
कुछ कहा-सुनी से जब कोई बात नही बनी तो उन्होंने ऐडीषनल जज की अदालत
में वाद दायर कर दिया. जब मामला सुनवाई हेतु आया तो जज महोदय ने वरमाजी को
पूछा कि आपने कुत्तें पाल रखे है जिनसे पडौसियों की षांती भंग होती है, आपको इस बारें
में क्या कहना है ? वरमाजी गुस्से से भरे हुए थे ही, बोले ‘हम न किसी से कुछ लेते है ना
किसी को कुछ देते है, अपनाही खाते है, अपनाही पीते हैं. हमनें कुत्तें पाले है इसमें दूसरों
को क्या एतराज है ?
...परन्तु दो दो कुत्तों की क्या आवष्यकता है ? जज महोदय ने पूछा.
...वैसे तो एक ही काफी है, हुजूर ! दूसरा तो ऐडीषनल हैं. वरमाजी ने उत्तर दिया.
यह सुनने के बाद जज महोदय ने सामने रखी फाइलों में ऐसी नजर गढाई कि फिर उठाई
ही नही जब तककि सारा इजलास खाली नही हो गयाउन
दिनों की बात है जब अधिकांष लोग कोर्ट कचहरी यातो पैदल जाते थे या तांगें
की सवारी करते थे. एक बार एक वकील साहब कचहरी जा रहे थे. रास्तें में षीतलामाता
के मंदिर के पास एक तेली की घाणी पडती थी. वहां घाणी पर एक बैल, जिसकी आंखों पर
लकडी के टॉपें लगे हुए थे, घाणी के कोल्हू के चारों तरफ चक्कर लगा रहा था. बैल के
गले में घन्टी भी बंधी हुई थी जिसकी आवाज से दूर बैठे तेली को पता चलता रहता था कि
बैल रूका नही, घूम रहा हैं. कौतुहलवष वकील साहब यह सब देख्कर ठिठक कर वही खडे
हो गए. उन्हें वहां देखकर तेली उनके पास आगया और पूछा कि हुकम, क्या बात है ? इस
पर वकील साहब ने उससे कहा कि मानलो यह बैल चलते चलते खडा हो जाय औेर
आवाज करने के लिए अपने गले में बंधी घंटी को घुमाता रहे तो तुमको कैसे पता लगेगा
कि यह घूम रहा है या रूका रूका ही घंटी बजा रहा है. इस पर तेली बोला ‘वकील साहब
वकालात की डिग्री आपने पास की है इस बैल ने नही की हैं. यह कर लेगा जब की तब
देखेंगेउस
जमानें में वकीलों के मुंषी अधिकांष में यातो कोई मियांजी होते थे या माथुर.
यह दोनों ही कौमें उर्दू में माहिर होती थी. मियां अब्दुल वहीद षहर के नामी फौजदारी
वकील, जिनका ऑफिस कडक्का चौक में हुआ करता था, के मुंषी थे. वकील साहब जज
महोदय के दूर के रिष्तें में भानजी दामाद लगते थे इसलिए, कहते है कि, उस समय उनकी
चवन्नी खूब चलती थी. यह निगोडी चवन्नी तो अब जाकर बंद हुई है. उस समय तो खूब
चलती थी आप किसी पुरुराने-यहां पुराने से मेरा आषय अधिक उम्रवालांे से हेै-आदमी को
पूछ सकते हेैंवही
मुंषीजी कचहरी की चाय की थडीपर बिछी मुडिडयों पर बैठे हुए अपने साथियों
को बता रहे थे कि एक बार एक आदमी से आवेष में आकर मर्डर होगया. वह चाहता था
कि उसे फांसी न होकर आजंम कैद होजाय. उसने हमारे वकील साहब से बात की. उन्होंने
उसे आष्वासन दिया कि तुम बेफिक्र रहो, मैं सब संभाल लूंगा. खैर जब फैसला हुआ तो
उस व्यक्ति को आजंम कैद की सजा सुनाई गई. वकील साहब और मैं उससे मिलने जेल
गए. वहां वकील साहब को देखते ही उसने उनका बहुत बहुत षुक्रिया अदा किया. वकील
साहब ने उससे कहा कि तुम बहुत किस्मतवालें हो जो तुम्हारें मन माफिक फैसला होगया
वर्ना जज साहब तो तुम्हें छोडनेवाले थे किसी तरह तुम्हें आजंम कैद करवाई हैंउसी
स्थान पर चाय पीते पीते मुंषी वहीद के दोस्त मुंषी देवकीनन्दन माथुर ने
बताया कि एक बार लालू-राबडीदेवी के राजकाल में हमारें वकील साहब अपने किसी
रिष्तेदार का केस लडने पटना गए. वहां उन्होंने कोर्ट में उस काम के साथ साथ एक
जनहितयाचिका भी दाखिल की कि इस राज्य में बिजली, पानी, षिक्षा, सुरक्षा इत्यादि कुछ भी
नही है. तब जज ने इन्हें कहा कि आप इसकी बजाय जनता को लेकर सडकों पर क्यों
नही आजाते ? यहां सडकें भी कहां है हुजूर ! इन्होंने जज को जवाब दियाकचहरी
में किसी फौजदारी केस की सुनवाई चल रही थी. वकील साहब एक
चष्मदीद गवाह से जिरह कर रहे थे. वाकया था कि गवाह ने मुजरिम-अभियुक्त- को रात्रि
में खून करते देखा था. उसका कहना था कि उस समय घटनास्थल के पास ही पेड पर एक
उल्लू भी था तो वकील साहब ने जोर देकर पूछा कि
... क्या तुमने उल्लू देखा है ?
गवाह सहमकर चुपचाप खडा रहा और इजलास की खिडकी से बाहर की तरफ देखने लगाइस
पर वकील साहब और भी भडक गए और गवाह से कहा
...उधर क्या देख रहे हो, मेरी तरफ देखो.
वकील साहब का इतना कहना था कि कोर्ट में मौजूद सभी लोग मुस्कराने लगे.
एक बार किसी दिवानी मुकदमें में वादी के वकील साहब अपनी जिरह पेष कर रहे
थे और नजीर पर नजीर दिए जा रहे थे. इस पर जज महोदय ने उनसे कहा कि मुझे तो
लग रहा है कि तमाम सबूतों और गवाहों के आधार पर कहा जा सकता हेै कि कसूरवार
आप हीे है, इस पर वादी के वकील ने तैष में आकर कहा कि ‘कौनैन साला कह रहा है ?
इसे सुनकर वहां उपस्थित सभी को बुरा लगा. जज साहब ने भी इसका संज्ञान लेते
हुए एतराज किया और अपने पेषकार से कहा कि वकील साहब को अदालत की मानहानि
का नोटिस दिया जाय. वहां खडे कुछ और वकीलों ने भी अपने साथी को समझाने की
कोषिष की. इस पर उन्होंने पलटा खाते हुए कहा कि मैंने तो यह कहा था कि कौनैनसा ‘ला’
कहता है ?
बाद में वकील साहब की इस दलील को कोर्ट भी मान गया और मामला वही रफा
दफा होगयाइसी
कचहरी की बात हेैं. एक चोरी के केस में एक वयोवृद्ध वकील साहब अभियुक्त
से जिरह कर रहे थे.
वकील:- क्या तुमने चोरी की ?
मुजरिमः- जी साहब
वकील:- अच्छा यह बताओ तुमने चोरी कैसे की ?
मुजरिमः- रहने दीजिए साहब, इस उम्र में आप यह सब सीखकर क्या करेंगे ?
यहां मृत्युलोक में तो कोर्ट कचहरियां होती ही है वहां यानि उपर जाने के बाद भी
वादविवाद चलते रहते हेैं. कहते है कि एक बार स्वर्ग और नरकवालों के बीच साझें की
दीवार को लेकर झगडा होगया. दोनों ही पक्षों का अपना अपना दावा था कि यह हमारी हद
हैं. बहस के दौरान यह बात उठी कि मामलें को अदालत में लेजाया जाय. इस पर
नरकवालों के चेहरें खिल उठे और स्वर्गवालें मायूस हो गए. वहतो बाद में यमदूतों ने
रहस्योदघाटन किया और बताया कि स्वर्ग में तो वकीलों का टोटा है, ढूंढें नही मिलतेउनका
केस लडेगा कौन ?
इस तरह इन दोनोही कचहरियों में मुकदमों के दौरान हंसी-मजाक की बातें भी होती
रहती हैंई.
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

फूल तो बहुत देखे अब तक



फूल तो बहुत देखे
अब तक
पर तुम्हारी सी
महक नहीं थी उनमें
साज़ तो बहुत सुने
तुम्हारी आवाज़ सी
खनक नहीं थी उनमें
चेहरे भी बहुत देखे
पर तुम्हारी सी
खूबसूरती नहीं थी उनमें
दिल बहुतों से लगाया
पर मन भरा नहीं उनसे
निरंतर भटकता रहा
पर मुकाम मिला नहीं
अब तक
जब से तुम्हें देखा
मंजिल
नज़र आ गयी मुझे
अब तुम्हारे बिना
सुकून
मिलेगा नहीं मुझे

अजीब हालात हैं

अजीब हालात हैं
सामने लोग
वाह वाह करते
पीठ पीछे हाय हाय
करते
दिल में नफरत का
अम्बार
लगा कर रखते
निरंतर
चेहरे को मुस्कारहट
से सजा कर रखते
मन में रोते रहते
ज़िन्दगी बर्बाद करते
रहते

नजाकत

उनकी
नजाकत का
अंदाज़ तो देखिए
उन्होंने
एक तितली को
छू लिया
हाथ में ज़ख्म
हो गया
निरंतर
मुस्काराता चेहरा
गम में डूब गया

दिल कभी ना मिलेंगे

मैं आप नहीं हूँ
आप मैं नहीं हैं
मैं
मैं रहना चाहता हूँ
आप
आप रहना चाहते हैं
यही तो समस्या है
जब तक
"मैं" आप नहीं
बनूंगा
आप "मैं" नहीं
बनेंगे
दिल कभी ना मिलेंगे
समस्या
समस्या ही रहेगी

वक़्त इतना

बेरहम क्यूं हो गया
क्यूं ठहर गया
खुदा जाने
दुआ भी करता हूँ ,
इबादत भी करता हूँ
फिर क्यों नहीं सुनता
खुदा जाने
कब तक करेगा हैरान
मर मर कर जिलाएगा
खुदा जाने
कब तक रुलाएगा
कब चेहरे पर मुस्कान
लाएगा
खुदा जाने
निरंतर सब्र रख रहा हूँ
सब्र का सिला देगा या नहीं
खुदा जाने
कब तक इम्तहान लेगा
यकीं उस पर बरकरार रखेगा
खुदा जाने
कब तक मेरी नियत ना
समझेगा
मुझे ना पहचानेगा
पहचानेगा ज़रूर एक दिन
कब पहचानेगा ये भी
खुदा जाने


कभी हम खुद को ही बहला लिया करते

कभी हम खुद को ही
बहला लिया करते
शीशे में
अपना अक्स देख कर
खूब मुस्कराया करते
अपने
खूबसूरत चेहरे पर
इतराया करते
जो खुले आम नहीं
कह पाते
निरंतर अकेले में
कह लिया करते
खुद की नादानियों पर
खुद को
डांट दिया करते
चाहने वालों को
ख़्वाबों में देख लिया
करते
दिल के अरमान
ख़त में लिख कर
खुद ही पढ़ लिया करते
कभी हम खुद को ही
बहला लिया करते

गर तूँ बेदिल होता

निरंतर
तेरा ये हाल
ना होता
गर तूँ बेदिल होता
तेरा दिल किसी को
देख कर ना धड़कता
ना किसी पर जाँ
निसार करता
ना बेकरार रहता
ना यादों में खोता
ना रातों को जागता
ना दिल से दिल
लगाता
ना बार बार टूटता
बिना मोहब्बत करे
जीता रहता
ज़िन्दगी का मकसद
भूल जाता
खुशकिस्मत समझ
खुद को
तूँ मोहब्बत की कीमत
समझता

मेरी कुंठा

मेरी कुंठा
बदहजमी करती
उल्टी सी
बाहर निकलने को
मचलती रहती
तड़पती रहती
कलम के जरिये
कह सुन कर
प्रेम से,क्रोध से
सोचे,बिना सोचे
मेरी भी कोशिश
निरंतर चलती रहती
पर क्या करूँ ?
बामुश्किल
एक निकलती
दूसरी घर बनाती
ख़त्म होने का नाम
ना लेती
मेरे व्यक्तित्व को
तार तार करती
मुझे उलझाए
रखती
डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मन सिर्फ मिलने से नहीं मिलते


मन सिर्फ मिलने से नहीं मिलते

उनसे बात करता हूँ

तो पता नहीं क्यों

अपने राज़ खोलने

लगता हूँ

वो भी ध्यान से

सुनते है

फिर धीरे से कहते है

सब्र रखो

सब ठीक होगा

मुझे लगता है

कभी मिले नहीं

फिर भी

वो मुझे समझते हैं

मन सिर्फ मिलने से

नहीं मिलते

निरंतर इस सत्य पर

विश्वास बढाते हैं




मैं फिर सोच में डूब गया........

अलसाया सा

मूढे पर बैठा था

सोच में डूबा था

चिड़िया की चहचाहट

ने ध्यान भंग किया

नज़रें उठायी

देखा तो रोशनदान पर

चिड़िया तन्मयता से

घोंसला बना रही थी

उसके सीधेपन पर

ह्रदय में दुःख होने लगा

लोगों ने निरंतर

बड़े पेड़ों

उनपर लगने वाले

घोंसलों को नहीं छोड़ा

अनगिनत पक्षियों को

बेघर किया

रोशनदान में लगे घोंसले

को कौन छोड़ेगा?

एक दिन इसे भी बेघर

होना पडेगा

अस्तित्व के लिए

लड़ना पडेगा

मैं फिर सोच में

डूब गया........


डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

मनुष्य बना कर रखना तुम

तानाशाह का अंत
का अंत समय था
अंतिम क्षण मन में
सोच रहा था
क्यों इर्ष्या,द्वेष,अहम्
अहंकार में
व्यर्थ किये करोड़ों क्षण
छोड़ जाऊंगा पीछे अब
मनों में
खट्टी यादें लोगों के
याद कर
जिन्हें तिलमिलायेंगे वो
खुल कर गाली देंगे
चीख चीख कर मेरा सत्य
संसार को बताएँगे
मेरी कब्र पर
एक फूल भी ना चढ़ाएंगे
धन दौलत सब पीछे रह
जायेगी
परिवार की दुर्गती होगी
क्यों समझ नहीं आया
जीवन भर
निरंतर
भटकता रहा खुदा के
पथ से
अहम्, अहंकार ताकत ने
मुझ को
मनुष्य से राक्षस बनाया
अब आँख मुंदने वाली है
अंतिम दुआ मान लो
मालिक
जन्म फिर से अवश्य देना
पर सम्राट नहीं बनाना तुम
अपनों से दूर ना होने देना
अहम् अहंकार से दूर
रखना
मनुष्य बना कर
रखना तुम


(लीबिया के तानाशाह शासक,कर्नल गद्दाफी की मौत पर)

आगे क्या होने वाला है ?

उम्र ढलने लगी थी
झुर्रियां बढ़ने लगी थी
सोच कांपने लगा था
विचारों का मंथन
त्वरित गति से
होने लगा था
आगे क्या होने वाला है ?
साफ़ दिखने लगा था
एक अजीब सा भय
मन में घर करने लगा
जीवन डगर
समाप्त होने का समय
अब दूर ना था
क्या होगा ?
कब अंत आयेगा ?
क्यों मनुष्य को
फिर लौटना पड़ता है
निरंतर मष्तिष्क में
सवाल कचोटने लगा
क्या करूँ
जिससे अंत समीप
ना आये
बहुत सहा जीवन में
जैसा चाहा
वैसा मिला नहीं
फिर भी जीने की चाह
कम ना हुयी
परमात्मा अब पहले से
अधिक याद आने लगा
अधिक से अधिक

जी सकूँ
जाऊं भी तो चुपके से
पता भी ना चले
नाम मात्र भी

कष्ट ना सहना पड़े
रात सोऊँ सवेरे
जागूँ ही नहीं
यही सोच बार बार
मन में
आने लगा था


डा.राजेंद्र तेला,"निरंतर"
"GULMOHAR"
H-1,Sagar Vihar
Vaishali Nagar,AJMER-305004
Mobile:09352007181

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

ऐसे थे हमारे हैड साहब !

हमारे दफ्तर के बड़े बाबूजी यानि हैड साहब यथा नाम तथा गुण थे। हैड साहब नौकरी लगने के दिनों से ही हर काम में अपनी दिमागी कसरत किया करते थे। अक्सर सरकारी कार्यालय की परम्परा के अनुसार नए-नए लगे बाबुओं को रिसिप्ट-डिस्पैच पत्र भेजने व प्राप्त करने के कार्य में लगाया जाता है, इसलिए जब हैड साहब को, हालांकि तब वह हैड नहीं थे, इस काम में लगाया गया तो उन्होंने यहां भी अपना दिल दिमाग एक कर दिया। यहां तक कि उसका असर उनके घर पर भी पडऩे लगा।
एक बार वे किसी के निमंत्रण पर सायंकाल का भोजन करने कहीं गए। जाते वक्त घरवाली से कह गए कि तुम खाना खा लेना। जब वह वापस लौटे तो घरवाली भी खाने के काम से निपट चुकी थी। हैड साहब जब सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनका कोई मित्र बाहर से उनके घर आ गया। हैड साहब ने औपचारिकतावश उससे खाने का आग्रह किया और इस बाबत अपनी बीवी से बात की। जब उन्हें मालूम हुआ कि बीबी ने कोई रोटी बचा कर नहीं रखी है तो वे काफी नाराज हुए। उन्होंने चिल्ला-चिल्ला कर सारा पास-पड़ौस इकट्ठा कर लिया। उनका कहना था कि जैसे ऑफिस में पत्रों की 'ओसीÓ अर्थात बचा हुआ पत्र रखी जाती है तो घर में भी रोटियों की 'ओसीÓ रखी जानी चाहिए ताकि सनद रहे और वक्त बेवक्त काम आए।
रिसिप्ट-डिस्पैच के बाद उन्हें कार्यालय की लेखा शाखा के बजट बनाने के काम में लगाया गया था। उन्ही दिनों एक अन्य सैक्शन के ऑफीसर ने उन्हें बुला कर पूछा कि तुम क्या काम करते हो? इस पर इन्होंने तत्काल अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए उत्तर दिया कि सर! मुझे 'बुडजटÓ (बजट) बनाने का कार्य दिया गया है। ऑफीसर 'बुडजटÓ शब्द सुन कर पहले तो थोड़ा अचकाया लेकिन बाद में उसे जब बात समझ आई तो वह मुस्कराए बिना नहीं रह सका और बोला कि अच्छा-अच्छा आप 'बुडजटÓ बनाते हैं।
पहले नौकरी, फिर शादी की सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो उन्होंने बड़े जोश-खरोश से अपने साथियों को दोपहर के खाने पर न्यौता दिया। प्रत्येक को निमंत्रण देते हुए कहा कि कल दोपहर हमारे यहां 'डिनरÓ है, आपको जरूर आना है। इधर दोस्तों ने भी जवाब दिया 'आएंगे भई, जरूर आएंगे. कल आपके यहां 'दोपहर के डिनरÓ पर अवश्य आएंगे।Ó
नौकरी के ही शुरुआती दिनों की बात है। एक बार एक ऑफीसर को किसी सरकारी आदेश की प्रति देखनी थी। उन्होंने अपने हैड साहब को बुला कर कहा कि आप 5 मई 1969 का सर्कुलर लेकर आओ। अब हैड साहब सारे कार्यालय में इधर-उधर खूब घूम लिए लेकिन उन्हें ऐसा कोई भी पत्र नहीं मिला। जो, उनकी समझ से, सर्कुलर यानि गोलाकार हो। सारे सरकारी कागज पत्र आयताकार थे। आखिर हार-थक कर उन्होंने अपनी शंका अपने एक साथी से जाहिर की कि फाइलों में तो सभी पत्र आयताकार है, सर्कुलर तो एक भी पत्र नहीं है, जबकि साहब 5 मई का सर्कुलर मांग रहे हैं। उनके साथी ने मुस्कराते हुए उन्हें समझाया कि सरकार के किसी आदेश विशेष को, जो सब कार्यालयों को भेजा जाता है, उसे सर्कुलर कहते हैं।
एक बार हैडसाहब को बस द्वारा नजदीक ही किसी जगह जाना था। जब उस जगह बस पहुंची, तभी वहां उतरने के लिए वे अपनी सीट से उठे । उसी समय उनके ऑफीसर, जिन्हें अचानक किसी काम से कहीं जाना था। बस में घुसे ऑफीसर ने ज्योंही उन्हें सीट से उठते हुए देखा तो शिष्टाचारवश कन्धा पकड़ क र बैठा दिया कि अरे-अरे बैठो-बैठो। आग्रह के बावजूद ऑफीसर खडे रहे। थोडी देर बाद बस अगले स्टॉप पर पहुंची तो हैड साहब फिर उतरने के लिए अपनी सीट से उठे, लेकिन इस बार फिर ऑफीसर ने उन्हें फिर सीट पर बैठा दिया। जब बस रवाना हुई तो उन्होंने हैड साहब से पूछा, 'आप कहां जा रहे हैं ?Ó इस पर हैड साहब ने बताया, 'मुझे तो पिछले स्टॉप पर ही उतरना था, आपने मुझे जबरदस्ती वापस बैठा दिया।Ó
उन दिनों हैड साहब की पोस्टिंग विभाग के मुख्यालय में थी और विभाग में आमूलचूल परिवर्तन होने वाले थे। विभाग बोर्ड के रूप में बदलने वाला था। जो भी मुख्यालय में आता, बोर्ड की ही चर्चा करता और पूछता कि बोर्ड कब तक बन जायगा। संयोग से उन्ही दिनों मुख्यालय में भंवरलाल नामक कारपेंटर भी काम कर रहा था। उसे चीफ इंजीनियर के कमरे में टांगने हेतु लकड़ी का एक बोर्ड बनाने हेतु कहा गया था। एक रोज बाहर से एक अधिकारी आया और बोर्ड के बारे में पूछने लगाा कि बोर्ड कब तक बनेगा, इस पर हैड साहब ने बताया कि पिछवाड़े भंवरलाल से जाकर पूछ लो कि बोर्ड कब तक बन जाएगा।
हैड साहब अपने ऑफीसरों के आदेशों का पालन करने में बड़े पाबंद थे और अक्षरश: उनका पालन करते थे। एक बार उनके ऑफीसर ने उन्हें किसी दूसरे स्थान से ट्रंक कॉल पर कहा कि मैं बस से आ रहा हंू या तो मैं सायंकाल 6 बजे पहुंचूंगा या रात 9 बजे, इसलिए ड्राइवर को बस स्टैन्ड भेज देना, वह देख लेगा। हैडसाहब ने ड्राइवर को बुला कर आदेश दिया कि तुम्हें साहब को लेने बस स्टैन्ड जाना है तथा साहब ने सायं 6 बजे अथवा रात्रि 9 बजे आने को कहा है। दोनो ही समय जाकर देखना है। ड्राइवर द्वारा यह कहने पर कि मैं 6 बजे साहब को लेने पहुंच जाऊंगा और साहब आ गए तो ठीक वरना 9 बजे जाकर देख लूंगा तो हैड साहब ने उससे कहा कि 6 बजे भी जाना है और 9 बजे भी। चाहे साहब 6 बजे आएं चाहे न आएं। साहब का आदेश है।
समय के साथ साथ हैडसाहब का काम बढऩे लगा। वह अक्सर मिलने-जुलने वालों से कहा करते थे कि मैं आजकल बहुत बूशी (बिजी) हूं।Ó इंगलिश में 'व्यस्तÓ माने 'बिजीÓ इस तरह लिखा जाता है कि कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति उसे 'बिजीÓ की जगह 'बूशीÓ पढ़ सकता है। उन्हीं दिनों उनके मातहत एक बाबू को कार्यालय में मच्छर दिखाई दिए। उसने अपनी शिकायत लिख कर हैडसाहब को भिजवा दी। हैडसाहब ने जब यह नोटशीट देखी तो उस पर कई प्रश्न पूछ डाले। मसलन मच्छर एक था या कई थे? वे आज ही दिखाई दिए या पहले भी दिखाई दिए थे? वे गजेटेड थे या नॉन गजेटेड थे? सीधी भर्ती वाले थे या प्रमोटी थे? वे कही से ट्रांसफर होकर तो यहां नहीं आएं? उनकी ज्वायनिंग रिपोर्ट कहां है? कई प्रश्न उन्होंने पूछ डाले और मसला फाइलों में ही दब कर रह गया।
इसी तरह एक बार कार्यालय के रिकार्डकीपर को कार्यालय में एक चूहा दिखाई दिया। उसने पहले तो मौखिक रूप से हैडसाहब को बताया, फिर लिख कर दिया कि रिकार्ड में एक चूहा दिखाई दिया है। अगर वह ऑफिस का रिकार्ड खा गया तो उसकी समस्त जिम्मेवारी आपकी, यानि हैड साहब की होगी। हैड साहब ने इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने ऑफीसर को नोटशीट पर लिखकर भेजा कि कार्यालय के रिकार्ड में एक चूहा देखा गया है, हो सकता है कि वहां चूहों ने कोई अवैध कॉलोनी बना ली हो, अत: इस बारे में नगर परिषद तथा यूआइटी को तत्काल कार्यवाही के लिए लिखना उचित होगा। हैडसाहब ने सोचा कि एक बार वहां से जवाब आ जाए तो आगे कार्यवाही करें। इधर दूसरे ही रोज सफाई करते हुए रामू सफाई वाले को रिकार्ड रूम में चूहा दिखाई दिया तो उसने अपनी झाडू से तत्काल उसे ठंडा कर दिया।
कार्यालय की चाहरदिवारी पर प्रवेश हेतु एक बड़ा गेट एवं उसके साथ ही एक छोटा गेट भी था। अकसर बड़े गेट से वाहन एवं छोटे गेट से पैदल लोग प्रवेश किया करते थे। एक बार की बात है कि छोटे गेट की चाबी चौकीदार से खो गई, इसलिए वह उसे खोल नहीं पाया, सिर्फ बड़ा गेट ही खुला था। जब हैड साहब कार्यालय आए तो रोज की तरह उन्होंने छोटे गेट से प्रवेश करना चाहा, लेकिन वह बन्द था। उन्होंने चौकीदार को बुलाया और गेट नहीं खुलने का कारण जानना चाहा। जब चौकीदार ने उन्हें बताया तो उन्होंने कहा कि अब लोग अंदर कैसे आएंगे? इस तरह के सैकड़ों किस्से लिए हैड साहब कुछ ही दिनों पूर्व रिटायर हुए हैं।
-ई. शिव शंकर गोयल,
फ्लैट न. 1201, आई आई टी इंजीनियर्स सोसायटी,
प्लाट न. 12, सैक्टर न.10, द्वारका, दिल्ली- 75.
मो. 9873706333